Thursday, April 20, 2017

गङ्गा मुक्ति के महत्वाकांक्षी महापुरुषों के महाभियान भाग -1

जैसे अरविन्द के आन्दोलन के दौरान अपने अपने हिस्से का हिंदुस्तान मांगने वाले राजनीति और सामाजिक सक्रियता वाले महानुभाव मिल रहे थे वैसे ही अपने अपने हिस्से की गंगा के दीवानों की भी बाढ़ बह चली है| गंगा भक्ति की इस भगवा धार को  उमा भारती ने हाल फिलहाल नमामि गंगे में समेट तो लिया लिया है| लेकिन तमाम महावीर ऐसे भी हैं जो गंगा की व्यथा कथा कह कर वाहवाही भी लिए और ‘व्यवस्था’ में भी काम आये| तकनीकी रूप से गङ्गा सफाई की सरकारी कहानी का एक अध्याय हुआ केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड| इसके जन्म के साथ साथ गंगा सफाई की कवायद तकनीकी रूप से दक्ष लोगों की भूमिका बनी| तकनीकी रूप से दक्ष आईआईटी कानपुर के एक प्रोफेसर साहब इसके पहले मेम्बर सेक्रेटरी हुए| जानकार बताते हैं कि प्रोफेसर साहब अपनी पूरी निष्ठां के कार्य करते हुए साथ जल शोधन इत्यादि तकनीकी कार्यों के महारथी हुए| आई.आई.टी. कानपुर के वही प्रोफ़ेसर साहब बाद में सन्यास ग्रहण करके स्वामी हुए| कुछ लोग तो कहते हैं कि उनको गंगा की दुर्दशा के लिए बोर्ड की कारस्तानी का एहसास हुआ| अपनी गलती समझ आई और उन्होंने गंगा मुक्ति का संकल्प ले लिया| कुछ लोग कहते हैं कि प्रज्ञा अपराध का बोध हो गया हो तो प्रायश्चित अनिवार्य है| आपको समझ आ जाए कि आपकी गलती से भीषण तबाही हुई है तो आपको बिना प्रायश्चित के मुक्ति या मानसिक विश्राम संभव नहीं|   गंगा आन्दोलन के पहले और बाद के कई दिनों तक स्वामीजी वाराणसी के श्रीविद्या मठ में रहे वहीँ रहे| शायद उनके लिए अध्यात्मिक जिज्ञासा का एक पड़ाव शंकराचार्य की शागिर्दी भी बनी| या शायद उनकी उम्मीद थी कि शंकराचार्य जी उनकी गंगा भक्ति के लिए कुछ प्रोत्साहन कर सकें| गंगा मुक्ति तो शंकराचार्य जी की उत्कट अभिलाषा भी रही है| प्रोफेसर साहब के श्रीविद्या मठ में रहते मुझे भी उनके दर्शन और सानिध्य का लाभ जरुर मिला| लेकिन जिस गंगा जिज्ञासा और उसके तकनीकी और अध्यात्मिक पक्ष की तलाश में मेरा वहां जाना और रुकना हुआ वह पूरी न हो सकी| सुबह शाम उनके दर्शन और सार्थक चर्चा के प्रयास और उनके अनुभवों से सीखने समझने की चेष्टा में कम से कम पांच दिन खर्च किये| लेकिन प्रोफेसर साहब की हठधर्मिता के चलते मुझे उनके सानिध्य में गंगा अभीष्ट की प्राप्ति न हो सकी| शायद प्रोफेसर साहब उर्फ़ स्वामीजी जी के लिए मेरे संकल्प और धैर्य का कोई मोल न था|  मेरा निष्कर्ष यह बना कि गंगा बचाओ के तमाम विज्ञापनों के फेर में प्रोफेसर साहब लोग आम जनता से खास किस्म की दूरी बनाये हुए हैं| गंगा मुक्ति यज्ञ में स्वामीजी की यह दृष्टि क्यों और कैसे हुई यह अलग विषय है  लेकिन बनारस में गंगा मुक्ति यज्ञ किसी खेमेबंदी से तो संभव नहीं| नतीजा हुआ कि गंगा मुक्ति हुई हो या नहीं हुई हो, प्रचार प्रसार का जो हवाई दौर बना था उसके बाद नरेन्द्र मोदी वाराणसी से लोकसभा चुनाव जरुर जीत गए वो भी यह कह कर कि मुझे गंगा मैया ने बुलाया है| गंगा मुक्ति के तीमारदारों के मुंह पर इससे जोरदार तमाचा क्या होगा कि गंगा को बाँधने वाली राष्ट्रीय जलमार्ग प्राधिकरण जैसी योजना का सूत्रपात भी बनारस से हुआ|
एक सज्जन और थे जो हरिद्वार से गंगा सागर तक गंगा यात्रा निकलने का संकल्प साझा किये, यह कहते हुए कि राजीव गाँधी से उनकी बड़ी नजदीकी थी| वो साहेब दिल्ली में अपने आवास पर दरबार लगा कर तमाम रोज हमारे धैर्य, संकल्प और दक्षता की परीक्षा लेते रहे| हमने भी यात्रा का मार्ग, कार्यक्रम, तकनीकी और सामाजिक अभियान बना देने में बहुत दिन मगजमारी की, सारी लिखा पढ़ी करके अभियान की बागडोर सँभालने में राजा साहब का साझीदार और सहयोगी बनने का अरमान भी जागृत हुआ| इस प्रत्याशिता की एक वजह थी| राजा साहब कहते थे कि कलयुग में दो देवता सगुण साकार रूप में विद्यमान हैं एक स्वयं सूर्यदेव और दूसरी गंगा मैया| वो गंगा मैया के चमत्कार की कोई तस्वीर भी दिखाए| हम राजा साहब के मुरीद और गंगा जी के स्वयंसेवी होकर जुट गए अभियान में| परीक्षा में कुछ कुछ आर्थिक सहयोग का भी आश्वासन हुआ| लेकिन ये सिलसिला चला होगा कुछ पंद्रह बीस दिन| उसके बाद राजा साहब की परीक्षा में घोषित रूप से असफल होकर हमने स्वराज की खबरनवीसी करने की राह फिर से पकड़ी| तीन चार महीने बाद हरिद्वार जाना हुआ अखबार की एक महाडील के लोभ में| वहीँ जानकारी हुई कि एक आध दिन आगे पीछे उन राजा साहब की सवारी सजी थी| लेकिन वह यात्रा किस नतीजे पर पहुंची उसका कुछ हाल चाल नहीं मिला| और मैंने कोशिश भी नहीं की|
लेकिन राजा साहब की गंगा भक्ति का परिणाम यह भी सुनने में आया कि वही राजा साहब बिहार के महादलित मुख्यमंत्री की पार्टी के खेवनहार बन कर बिहार विधानसभा चुनाव में भी उतरे| यह गंगा मुक्ति आन्दोलन का राजनीतिकरण जैसा नजारा था| लेकिन गंगा की विराटता के साइज़ की राजनीति तो पांच प्रदेशों में दिग्विजय से कम नहीं होनी चाहिए थी| खैर, कुछ लोग तेरह उधार से नौ नगद ज्यादा बेहतर मानते हैं| राजनीति में माया मिली न राम जैसे इन दो उदाहरणों से यह बात तो साफ़ हुई कि चवन्नी के चक्कर में रुपय्या छोड़ने वालों की कमी नहीं है| आजकल समग्रता की सोच का अकाल है| सबको अपनी शकल अपनी अकल और योजना का बखान करके फूले नहीं समाते| उन सबसे सावधान रहने की जरुरत है| गंगा की बात के लिए दिमाग और जुबान चाहे कितनी तेज हो छोटे दिल से गंगा की विराटता का अनुमान तक कर पाना संभव नहीं| गंगा की बात करने के लिए, गंगा जी के साथ भक्ति  भावना गंगा की समग्रता से ही संभव हो सकती है| यूँ नहीं गीता में भगवान ने स्वयं का एक रूप गंगा बताया है|

पवनः पवतामस्मि, रामः शास्त्रभृताम्यहम
झषाणां मकरश्चामस्मि स्रोतस्मास्मि जाह्नवी|| श्रीमद्भागवतगीता 10.31

इसलिए यह तो स्वीकार करना पड़ेगा कि सच्चाई की बात तो समग्रता में ही हो सकेगी| भावना से हो सकेगी|  राजनैतिक व्यवस्था हो या सामाजिकता इसलिये गङ्गा की बात करिये तो समग्रता की बात करिये| तकनीकी कारस्तानी और राजनैतिक कारसाजी के सरमायेदार कुछ और महापुरुषों के महाभियान के किस्से अगले भाग में...   

जय गंगा मैया!!