Sunday, May 28, 2017

गंगा के लिए अनशनकारियों पर उत्तराखण्ड पुलिस का कहर, हत्या की आशंका जताई

ताजा खबर है कि हरिद्वार  की गंगा में अवैध खनन को लेकर उत्तराखण्ड सरकार ने अनशन पर बैठे  स्वामी  शिवानन्द और  ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद के विरुद्ध पुलिस बल का प्रयोग किया है| मातृ सदन आश्रम के शिष्यों ने आरोप लगाया है कि पुलिस ने आश्रम में तोड़-फोड़ की कार्रवाई की और ज्यादती भी की है| शिष्यों को पुलिसिया कार्रवाई में  स्वामीजी की हत्या की भी आशंका है|  
गौरतलब है कि  मातृ सदन आश्रम भ्रष्टाचार और पर्यावरण की धांधलियों के लिए अदालत तक की कानूनी लड़ाई लड़ी है| स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद भी हरिद्वार के मातृ सदन मे अनशन कर चुके हैं| आश्रम द्वारा जारी किये गये एक बयान मे आरोप लगाया गया है कि सरकार ने वर्ष 2006 के पर्यावरणीय प्रभाव की रिपोर्ट की अवहेलना करके काम किया| इतना ही नहीं खनन करने के विरुद्ध तपस्यारत स्वामी निगमानंद सरस्वती जी की हत्या भी करवाई दी| बयान में आशंका जताई गयी है की सरकार मातृ सदन के दूसरे संतों की हत्या की साजिश कर रही है| आश्रम की वेबसाइट पर जारी किये गए बयान में मातृ सदन ने  अपील की है  कि लोग सत्ताधारी पार्टी के असलियत को समझें| आश्रम संचालकों ने दावा किया है कि खनन के खिलाफ अनशनकारियों के दमन में मुख्य मंत्री  त्रिवेन्द्र सिंह रावत के साथ साथ  राजस्व मंत्री  प्रकाश पन्त, मंत्री मदन कौशिक और विधायक यतीश्वरानंद की मिलीभगत  हैं | आश्रम द्वारा जारी बयान में यह भी कहा गया है कि एक तरफ मा. उच्च न्यायालय ने गंगा नदी को जीवित प्राणी का दर्जा दिया है, वहीँ मुख्य सचिव एस. रामास्वामी , औद्योगिक सचिव शैलेश बगौली , निदेशक एवं अपर सचिव विनय शंकर पाण्डेय  गंगा नदी को बर्बाद करने पर तुले हुए हैं|
वैज्ञानिक अध्ययन को आधार बना कर मातृ सदन ने दावा किया है कि गंगाजी में एक भी पत्थर और बोल्डर ऊपर से लुढ़ककर नहीं आता है| इस सम्बन्ध में केंद्रीय पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की दो जांच रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए  कहा  है कि पत्थरों और बोल्डर की प्रतिपूर्ति असंभव है| यह भी बताया है कि 1998 में हुए खनन से बने गड्ढे अभी भी जैसे का तैसे ही है| इस सम्बन्ध में केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड  ने 6 दिसंबर 2016 को प्रदूषण अधिनियम  के तहत निर्देश जारी किया कि गंगा के रायवाला से भोगपुर के बीच खनन बंद हो| साथ ही केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अवैध खनन रोकने और गंगा किनारे 5 किलोमीटर की दूरी तक संचालित स्टोन क्रेशरों को बंद करने का भी आदेश जारी किया गया था| 

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आदेश को सख्ती से लागू करने के लिए उत्तराखण्ड हाई कोर्ट ने भी आदेश दिया है| विदित हो कि सरकार ने  कोर्ट के आदेश  को दरकिनार कर खनन खोल दिया गया है| मातृ सदन ने मांग की है कि अवैध खनन की गतिविधियों को शह देने वाले अधिकारियों को तत्काल निलंबित किया जाए|  गंगा  में खनन बंद करने की मांग को लेकर  ब्रह्मचारी आत्मबोधानन्द विगत दो सप्ताह से अनशन पर हैं| वेबसाइट पर जारी बयान के मुताबिक विगत छब्बीस मई  को स्वामी शिवानन्द ने भी  निर्जल अनशन शुरू कर दिया  है|

Friday, May 19, 2017

मोदी सरकार बना रही है विकास का हरित मार्ग

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) ने पिछले तीन वर्षों के दौरान हरित मार्ग के माध्‍यम से सतत विकास अर्जित करने की दिशा में कई कदम उठाए हैं।
वन :
राष्‍ट्रीय वन नीति के उद्देश्‍यों के अनुरूप एमओईएफसीसी ने वन आच्‍छादन को बढ़ाकर  भौगोलिक क्षेत्र के 33 प्रतिशत तक करने के लिए रूपरेखा बनाई है। हरित भारत मिशन का लक्ष्‍य वन गुणवत्‍ता तथा 5 मिलियन हेक्‍टेयर को कवर करने के वार्षिक लक्ष्‍य के साथ बंजर भूमि का पुनर्वनीकरण करना है।
घटते वन आच्‍छादन की समस्‍या पर विचार करने तथा विकास उद्देश्‍यों के लिए काटे गए वनों की क्षतिपूर्ति के लिए 2016 में संसद में क्षतिपूर्ति वनीकरण विधेयक पारित किया गया जिसे कि 42,000 करोड़ रूपये का उपयोग किया जा सके। इस निधि का संग्रह उन वनों से प्राप्‍त वसूलियों से किया गया था जिनका उपयोग गैर वन उद्देश्‍यों के लिए किया गया था।
यह एक पार‍दर्शी तरीके से वनों के संरक्षण, बेहतरी के लिए निधियों के उपयोग को सुगम बनाता है। केंद्र सरकार ने विभिन्‍न वन कार्यकलापों को महात्‍मा गांधी राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांरटी योजना के साथ अभिसरित करने के लिए कदम उठाए हैं। इससे देश के जनजातीय बहुत अंदरुनी वन क्षेत्रों में प्रत्‍यक्ष रोजगार के 15 करोड़ श्रम दिवसों का सृजन होगा।
इन कार्यक्रमों का कार्यान्‍वयन लोगों की सहभागिता, विशेष रूप से संयुक्‍त वन प्रबंधन कार्यक्रमों एवं ग्राम वन समितियों या वन सुरक्षा समितियों के द्वारा किया जाएगा।
चूंकि देश शहरीकृत हो रहा है, केंद्र सरकार ने नगर वन उद्यान योजना नामक शहरी वन सृजन करने की एक नवीन योजना आरंभ की है। न्‍यूनतम 15 हेक्‍टेयर वनों का शहरों में सृजन किया जाएगा। इससे मनोरंजन संबंधी आवश्‍यकताओं की भी पूर्ति होगी तथा वाहनों के प्रदूषण से वायु को शुद्ध करने के द्वारा फेफड़ों में शुद्ध हवा की आपूर्ति होगी। इसे विद्यालय पौधशाला योजना से भी जोड़ा गया है जिसका उद्देश्‍य छात्रों एवं प्रकृति के बीच एक स्‍थायी रिश्‍ते का भी निर्माण करना है।
राष्‍ट्रीय उद्दयानों एवं वन जीवन अभ्‍यारण्‍यों के संरक्षित क्षेत्र जैव विविधता के संरक्षण एवं वन जीवन के निवास की सुरक्षा में बेहद महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। इन सरंक्षित क्षेत्रों पर दबाव को कम करने के लिए, 275 पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्रों (ईएसजेड) को मंजूरी दी गई है तथा इसी के अनुरूप नीति को कार्यान्वित करने के लिए अधिसूचना जारी कर दी गई है।

जलवायु परिवर्तन :
भारत को व्‍यापक स्‍तर पर जलवायु परिवर्तन के प्रकोप का सामना करना पड़ रहा है। 2017 में मार्च के महीने के दौरान सामान्‍य से अधिक तापमान के कारण उग्र मौसम स्थितियों एवं जल की भारी कमी के कारण खाद्य उत्‍पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
जलवायु परिवर्तन के मुख्‍य वाहकों में से एक फॉसिल र्इंधन ऊर्जा स्रोतों के बढ़ते उपयोगों के कारण कार्बन का उत्‍सर्जन है। ऐसा अनुमान है कि अगर तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है तो देश को जीडीपी के 1.7 प्रतिशत हिस्‍से से हाथ धोना पड़ सकता है। इस रुझान को रोकने के लिए भारत ने स्‍वेच्‍छा से 2030 तक अपनी जीडीपी की कार्बन उर्त्‍सजन तीव्रता में 33 से 35 प्रतिशत तक की कमी लाने पर सहमति जताई है, जो कि 2005 का स्‍तर है।
2 अक्‍टूबर, 2015 को गांधी जयंती पर भारत के राष्‍ट्रीय रूप से प्रतिबद्ध योगदान  (आईएनडीसी) को लॉंच करते हुए प्रधानमंत्री ने जलवायु परिवर्तन की असुविधाजनक सच्‍चाईसे निपटने के लिए  एक सुविधाजनक कदम उठाने की अपील की थी।
भारत को अपने सबसे निर्धन समूहों तक पहुंचने के लिए विकास की मांगों को पूरा करने तथा निम्‍न कार्बन उर्त्‍सजन मार्ग का अनुसरण करने की दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ता है। इसे अर्जित करने के लिए इसे निर्वहनीय जीवन शैलियों तथा जलवायु न्‍याय का सहारा लेना पड़ता है, जिससे कि यह निर्बल समूहों के हितों की रक्षा कर सके।
इस लक्ष्‍य तक पहुंचने का रोड मैप क्‍या है ? एक निम्‍न कार्बन अर्थव्‍यवस्‍था के लिए अर्थव्‍यवस्‍था के विभिन्‍न क्षेत्रों में उत्‍पादित की जाने वाले तथा उपयोग में लाई जाने वाली ऊर्जा के तरीके में अमूल-चूल बदलाव की आवश्‍यकता होगी। आईएनडीसी ने गैर फॉसिल ईंधन आधारित स्रोतों से बिजली की 40 प्रतिशत क्षमता के उत्‍पादन का लक्ष्‍य निर्धारित किया है। 3500 मिलियन रूपये या 56 मिलियन डॉलर के राष्‍ट्रीय अनुकूलन फंड के गठन से कार्बन उत्‍सर्जन में कमी लाने के लक्ष्‍य को अर्जित करने के लिए विविध पहलों के जरिये नवीकरण ऊर्जा की दिशा में नीतियां आरंभ की जाएंगी। मुख्‍य फोकस पवन, स्‍वास्‍थ्‍य, जल पर अतिरिक्‍त मिशनों तथा टिकाऊ कृषि पर मिशनों की फिर से रूपरेखा बनाने के साथ राष्‍ट्रीय जलवायु परिवर्तन का कार्रवाई (एनएपीसीसी) के तहत राष्‍ट्रीय मिशनों पर फिर से विचार करने पर है।
जहां नीतियों का जोर स्‍वच्‍छ एवं नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की दिशा में है, इसमें ऊर्जा दक्षता  अपशिष्‍ट से संपदा के संवर्धन, हरित परिवहन एवं वन आच्‍छादन में बढ़ोतरी के जरिये कार्बन सिंक को बढ़ाने पर भी बल दिया गया है।
एनएपीसीसी के तहत हरित भारत मिशन 2030 तक 10 मिलियन हेक्‍टेयर में पौध रोपण की योजना कार्यान्वित कर रहा है। इससे 2.5 बिलियन टन तक अतिरिक्‍त कार्बन सिंकों का सृजन होगा।
जलवायु परिवर्तन के लिए एक राष्‍ट्रीय अनुकूलन फंड की स्‍थापना की गई है जिससे कि अनुकूलन की लागत की पूर्ति के लिए राज्‍य स्‍तरीय कार्यकलापों की सहायता की जा सके। अनुकूलन कार्यक्रमों को कार्यान्वित करने के लिए 16 राज्‍यों  के लिए 331 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई है।

नदी संरक्षण :
 नदी प्रणालियों के संरक्षण के लिए कदम उठाने हेतु राष्‍ट्रीय नदी संरक्षण योजनाओं (एनआरसीपी) को आरंभ किया गया है, जिनका उद्देश्‍य प्रदूषित नदियों की सफाई करना है। नदियों में प्रदूषण स्‍तरों को नियंत्रित करने के लिए राज्‍य सरकारों तथा स्‍थानीय निकायों,स्‍वतंत्र पेशेवर निकायों एवं स्‍वतंत्र परियोजना निर्देशकों के बीच समझौतों के एक त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन पर हस्‍ताक्षर किया गया है।
पंजाब में सतलज, घग्‍घर नदियों में प्रदूषण उपचार संयंत्रों की स्‍थापना में 50 प्रतिशत से अधिक लक्ष्‍य हासिल कर लिया गया है। गुजरात में साबरमती संरक्षण परियोजना चरण-IIआरंभ की गई  है। एमओईएफसीसी सिक्किम एवं नगालैंड के पहाड़ी राज्‍यों समेत भारत में विभिन्‍न राज्‍यों में एनआरसीपी कार्यान्वित कर रहा है।
पूर्वोत्‍तर भारत में सबानसा‍री, तवांग, बिछोम एवं सियांग हेतु विकास परियोजनाओं के सहायता मूल्‍यांकन के लिए नदी बेसिन संचयी प्रभाव विश्‍लेषण एवं ढुलाई क्षमता अध्‍ययन किए गए।
दलदली भूमि पारिस्थितकी प्रणाली जल को शुद्ध करने में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा करती है। भारत भर में 40 बड़ी दलदली भूमियों के लिए 13.43 करोड़ रुपये की लागत से प्रबंधन कार्य योजनाएं आरंभ की गई हैं।

ठोस अपशिष्‍ट एवं वायु प्रदूषण निपटान:
इन कदमों के अतिरिक्‍त, एमओईएफसीसी ने देश में सृजित किए जा रहे विभिन्‍न प्रकार के गैर जैव नष्‍ट किए जाने योग्‍य अपशिष्‍टों के निपटान के लिए ठोस, प्‍लास्टिक, जैवचिकित्‍सा एवं ई अवशिष्‍ट प्रबंधन के लिए नियमों को अधिसूचित किया है।
वायु प्रदूषण के स्‍वास्‍थ्‍य नुकसानों के बारे में आम लोगों को अवगत कराने के लिए एक पारद‍र्शी प्रणाली सृजित कराने के लिए 16 नगरों में वायु गुणवत्‍ता सूचकांक आरंभ की गई है। यह प्रतिदिन के आधार पर वास्‍तविक समय में वायु प्रदूषण के स्‍तर को ईंगित करता है। इस डाटा के साथ नागरिक शहरों में वायु गुणवत्‍ता की निगरानी कर सकते हैं।
एमओईएफसीसी ने वृक्ष रोपण, जलसंरक्षण एवं निम्‍न कार्बन जीवन शैली पर जागरुकता एवं ठोस अवशिष्‍ट प्रबंधन में 11 लाख युवाओं को प्रतिभागी बनाया है।
भारत नई पीढ़ी के प्रशीतकों एवं संबंधित निर्वहनीय प्रौद्योगिकियों, जो ओजोन स्‍तर को नुकसान पहुंचाती है, के विकास में घरेलू नवोन्‍वमेषण उपलब्‍ध कराने के जरिये एचएफसी से दूर हटने के साथ आगे बढ़ रहा है।
मंत्रालय ने अंतरिक्ष विभाग के साथ भारत का मरुस्‍थलीकरण एवं भूमि अवकर्षण मानचित्रका विकास किया है। यह 2005 से 2013 तक विभिन्‍न राज्‍यों में वर्तमान भूमि उपयोग, एवं भूमि अवकर्षण की तीव्रता पर विस्‍तृत जानकारी उपलब्‍ध कराता है। यह समेकित आंकड़ा देश में भविष्‍य के भूमि उपयोग के लिए आधार उपलब्‍ध कराएगा।
लेखक पांडुरंग हेगड़े  कर्नाटक में स्थित एक स्‍वतंत्र पत्रकार एवं स्‍तंभकार हैं

सरकारी बयान: NSSO की रिपोर्ट का ठीक से अध्‍ययन करें पत्रकार

  • स्वच्छता और आंकड़ों के विषय में नीति निर्माताओं और पत्रकारों की आम राय नहीं बन सकी| पत्रकारों द्वारा लिखी रिपोर्टों को भ्रामक और असत्य मानते हुए सरकार ने एक बयान जारी करके कहा है कि पत्रकार पढ़ लिख कर विवेचन करके सरकारी रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया दें|   
सरकार का कहना है कि एनएसएसओ (राष्‍ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन) द्वारा  कराए गए तीव्र स्‍वच्‍छता सर्वेक्षण के निष्‍कर्षों को मीडिया ने गलत तरीके से उद्धरित किया गया है साथ ही साथ गलत निष्‍कर्ष निकाले गए हैं। इतना ही नहीं, जारी किये गए एक सरकारी बयान में कहा "मीडिया की इन खबरों में निकाले गए निष्‍कर्ष न केवल तथ्‍यात्‍मक दृष्टि से गलत हैं, बल्कि उनकी व्‍याख्‍या भी  गलत तरीके से की गई है"। 
सरकारी बयान में इस्‍तेमाल कर्ताओं से अपेक्षा की गयी है कि वे परिशिष्‍टों सहित, स्‍वच्‍छता स्थिति रिपोर्ट का, विशेष रूप से 'कन्‍सेप्‍ट्स और डेफिनेशन्‍स' यानी 'अवधारणाओं और परिभाषाओं का विस्‍तार से अध्‍ययन करें, ताकि उसके निष्‍कर्षों को सही सही और पूर्ण रूप से समझा जा सके।
साथ ही साथ सरकार ने जरुरी माना है कि सभी सम्‍बद्ध पक्षों को तथ्‍यों की सही स्थिति और सही व्‍याख्‍याओं से अवगत कराया जाये। सरकारी एजेंसी ने सर्वेक्षण के सभी सम्‍बद्ध पक्षों की जानकारी के लिए स्‍पष्‍टीकरण भी जारी किये हैं| स्पष्टीकरण के लिए जारी बयान में बताया गया है कि स्‍वच्‍छता की स्थिति के बारे में तीव्र सर्वेक्षण के लिए अवधि मई-जून 2015 थी, अत: 45.3 प्रतिशत ग्रामीण स्‍वच्‍छता कवरेज सहित, स्‍वच्‍छता स्थिति रिपोर्ट के सभी निष्‍कर्ष, केवल जून 2015 तक की अवधि से संबद्ध हैं। जाहिर है कि ये निष्‍कर्ष लगभग दो वर्ष पुराने है, और स्‍वच्‍छ भारत अभियान की केवल नौ महीने की अवधि से संबद्ध हैं। साथ ही सर्वेक्षण में भारत सरकार द्वारा बनाए गए शौचालयों की संख्‍या के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है।
गौरतलब है कि सर्वेक्षण रिपोर्ट में वास्तविक संख्या न देते हुए शौचालय की सुविधा रखने वाले परिवारों का प्रतिशत; और  शौचालयों में इस्‍तेमाल के लिए पानी तक पहुंच रखने वाले परिवारों (उन परिवारों में जो शौचालय रखते हैं) का प्रतिशत ही बताया गया है। सर्वेक्षण के परिणामों से पता चलता है कि शौचालय रखने वाले सभी परिवारों में से ग्रामीण क्षेत्रों में 9% और शहरी क्षेत्रों में 99% परिवारों की पहुंच इन शौचालयों के लिए पानी तक थी।
आंकड़ों में कैसे उलझा स्वच्छता सर्वेक्षण 
  • एनएसएसओ (राष्‍ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन) द्वारा  कराए गए तीव्र स्‍वच्‍छता सर्वेक्षण की रिपोर्ट के पैरा 8.10.1, में निम्‍नांकित जानकारी दी गई है:
ग्रामीण भारत में, 42.5% परिवारों की पहुंच शौचालयों में इस्‍तेमाल के लिए पानी तक पायी गई.”
कुछ आलेखों में इससे यह निष्‍कर्ष निकाला गया कि शौचालय रखने वाले परिवारों में से केवल 42.5 प्रतिशत की पहुंच पानी तक है। यह व्‍याख्‍या गलत है।
सरकारी एजेंसी ने चेताया है कि उक्त सूचना को सही संदर्भ में यूँ समझा जाना चाहिए कि ग्रामीण क्षेत्रों में सभी परिवारों में से केवल 42.5% परिवारों को शौचालयों के लिए पानी उपलब्‍ध है। यदि आप इस बात पर विचार करें कि शौचालय रखने वाले परिवारों में से कितने प्रतिशत परिवारों की पहुंच पानी तक है, तो हम बताना चाहते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय रखने वाले कुल परिवारों में से 93.9% और शहरी क्षेत्रों में 99% परिवारों की पहुंच इन शौचालयों के लिए पानी तक थी।
गौरतलब है कि उक्त रिपोर्ट में घरेलू अपशिष्‍ट जल की निकासी के बारे में बताया गया था, जिसमें रसाई आदि से अपशिष्‍ट जल शामिल था और शौचालयों का मलजल उसमें शामिल नहीं था। 
स्रोत : http://pib.nic.in/newsite/hindirelease.aspx?relid=61061

देश के 91 प्रमुख जलाशयों के जलस्तर में एक प्रतिशत की कमी आई


18 मई, 2017 को समाप्त सप्ताह के दौरान देश के 91 प्रमुख जलाशयों में 35.622 बीसीएम (अरब घन मीटर) जल का संग्रहण आंका गया। यह इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 23 प्रतिशत है। यह पिछले वर्ष की इसी अवधि के कुल संग्रहण का 123 प्रतिशत तथा पिछले दस वर्षों के औसत जल संग्रहण का 104 प्रतिशत है। 11 मई को समाप्त हुए सप्ताह के अंत में यह 24 प्रतिशत थी।
   इन 91 जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता 157.799 बीसीएम है, जो समग्र रूप से देश की अनुमानित कुल जल संग्रहण क्षमता 253.388 बीसीएम का लगभग 62 प्रतिशत है। इन 91 जलाशयों में से 37 जलाशय ऐसे हैं जो 60 मेगावाट से अधिक की स्थापित क्षमता के साथ पनबिजली संबंधी लाभ देते हैं।
                             क्षेत्रवार संग्रहण स्थिति

उत्तरी क्षेत्र
उत्तरी क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश, पंजाब तथा राजस्थान आते हैं। इस क्षेत्र में 18.01 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले छह जलाशय हैं, जो केन्द्रीय जल आयोग (सीडब्यूसी) की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 4.25 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 24 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 21 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 28 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है, लेकिन पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से यह कमतर है।

पूर्वी क्षेत्र
पूर्वी क्षेत्र में झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल एवं त्रिपुरा आते हैं। इस क्षेत्र में 18.83 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 15 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 5.88 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 31 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 25 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 20 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है।

पश्चिमी क्षेत्र
पश्चिमी क्षेत्र में गुजरात तथा महाराष्ट्र आते हैं। इस क्षेत्र में 27.07 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 27 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 7.19 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 27 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 15 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 27 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण के बराबर है।

मध्य क्षेत्र
मध्य क्षेत्र में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ आते हैं। इस क्षेत्र में 42.30 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 12 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 14.27 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 34 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 26 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 21 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है।

दक्षिणी क्षेत्र
दक्षिणी क्षेत्र में आंध्र प्रदेश (एपी), तेलंगाना (टीजी), एपी एवं टीजी (दोनों राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं), कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडु आते हैं। इस क्षेत्र में 51.59 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 31 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 4.04 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 8 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 11 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 18 प्रतिशत था। इस तरह चालू वर्ष में संग्रहण पिछले वर्ष की इसी अवधि में हुए संग्रहण से कमतर है, और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी कमतर है।
पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में जिन राज्यों में जल संग्रहण बेहतर है उनमें पंजाब, राजस्थान, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश,  मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना शामिल हैं। पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में जिन राज्यों में जल संग्रहण बराबर है, उनमें एपी एवं टीजी (दोनों राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं) शामिल हैं। इसी अवधि के लिए पिछले साल की तुलना में कम संग्रहण करने वाले राज्यों में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु शामिल हैं।

गंगा से गाद निकालने के लिए चितले समिति ने दिए सुझाव


गंगा से गाद निकालने के लिए चितले समिति ने कई उपायों की सिफारिश की है, जिनमें गाद हटाने के कार्य के लिए वार्षिक गाद बजट से सबसे अधिक गाद हटाने की प्रक्रिया का अध्‍ययन करना, पहले हटाई गई तलछट/गाद के बारे में बताते हुए वार्षिक रिपोर्ट(रेत पंजीयन) तैयार करना और तलछट बजट बनाने का कार्य एक तकनीकी संस्‍थान को सौंपा जा सकता है, आकृति और बाढ़ प्रवाह का अध्‍ययन जिसमें सबसे अधिक गाद वाले स्‍थान से गाद हटाने की आवश्‍यकता का निरीक्षण और पुष्टि करने पर विचार किया जाना शामिल है।
      जल संसाधन नदी विकास और गंगा पुनरोद्धार मंत्रालय ने भीमगौड़ा(उत्‍तराखंड) से फरक्‍का(पश्चिम बंगाल) तक गंगा नदी की गाद निकालने के लिए दिशा निर्देश तैयार करने के वास्‍ते जुलाई 2016 में इस समिति का गठन किया था। राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण (एनजीआरबीए) के विशेष सदस्‍य श्री माधव चितले को समिति का अध्‍यक्ष नियुक्‍त किया गया था। समिति के अन्‍य सदस्‍य जल संसाधन, नदी विकास और गंगा पुनरोद्धार मंत्रालय में सचिव, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में सचिव और केन्‍द्रीय जल तथा विद्युत अनुसंधान स्‍टेशन, पुणे के निदेशक डॉक्‍टर मुकेश सिन्‍हा थे। समिति से गाद और रेत खनन के बीच अंतर करने तथा पारिस्थितिकी और गंगा नदी के ई-प्रवाह के लिए गाद हटाने की आवश्‍यकता के बारे में बताने को कहा गया था।
      समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भूमि कटाव, तलछट की सफाई और गाद अति जटिल घटनाएं हैं। तलछट प्रबंधन और नियंत्रण के लिए ‘सभी के लिए एक प्रकार’ का रूख अपनाया नहीं जा सकता, क्‍योंकि यह मामले अधिकतर क्षेत्र विशेष से जुड़े होते हैं। भौगोलिक, नदी नियंत्रण संरचनाएं, मृदा और जल संरक्षण उपाय, वृक्षों की संख्‍या, नदी के तट की भूमि का उपयोग या उसमें फेरबदल (उदाहरण के लिए कृषि, खनन आदि) जैसे स्‍थानीय कारकों का नदी के तलछटी के भार पर काफी प्रभाव पड़ता है। नदी नियंत्रण संरचनाओं  (जैसे जलाशयों), मृदा संरक्षण उपायों और तलछट नियंत्रण कार्यक्रमों से गाद कम जमा हो सकती है, जबकि भूमि उपयोग में फेरबदल (उदाहरणार्थ वनस्‍पतियों की सफाई) या खेती जैसी गतिविधि‍यों से गाद बढ़ सकती है। ऐसे में अंधाधुंध गाद हटाने से पारिस्थितिकी और पर्यावरण प्रवाह को अधिक नुकसान हो सकता है। इसलिये गाद हटाने के लिये दिशा निर्देश और बेहतर व्‍यापक सिद्धांत तैयार करने की आवश्‍यकता है, जिन्‍हें गाद हटाने की योजना बनाने और उसके कार्यान्‍वयन के समय ध्‍यान में रखा जाना चाहिये।
      रिपोर्ट के अनुसार गंगा जैसी बड़ी नदियों में भूमि कटाव, तलछटी हटाने और गाद अति जटिल घटनाएं हैं और उनका अनुमान लगाने में अंर्तनिहित सीमाएं और अनिश्चितताएं होती हैं।  गुगल अर्थ के नक्शे पर मुख्य नदी गंगा की पैमाइश से पता चलता है कि विभिन्न पाट गतिशील संतुलन चरण में हैं। तलछटी मुख्‍यरूप से भीमगौड़ा बैराज के नीचे की ओर तथा गंगा में मिलने वाली सहायक नदियों के संगम स्‍थल के नजदीक देखी गई है। अत्‍यधिक गाद, बड़े पैमाने पर तलछट का जमाव और इसके नकारात्मक प्रभाव मुख्य रूप से घाघरा और उसके आगे संगम के नीचे की ओर पाया जाता है। घाघरा के संगम से आगे मैदानी इलाके में बाढ़ तेजी से बढ़ कर लगभग 12 से 15 मिलोमीटर तक फैल जाती है।
      समिति का कहना है कि हालांकि गाद हटाने से नदी के जलीय प्रदर्शन में सुधार हो सकता है और इसलिए गाद हटाने के कार्य को न्‍याय संगत ठहराया जा सकता है, लेकिन नदी के पर्यावरण प्रवाह के सुधार में इसकी कोई प्रत्‍यक्ष भूमिका नहीं होती है। दूसरी ओर अंधाधुंध गाद हटाने या रेत खनन से नदी के ई-प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। नदियों से तलछटी हटाने के महत्‍व को पहचानते हुए गाद हटाने का कार्य करते समय निम्‍नलिखित मूल सिद्धांतों को ध्‍यान में रखना चाहिए:
  • नदी प्रणाली में गाद प्रवाह कम करने के लिए कृषि की बेहतर पद्धतियों और नदी तट की सुरक्षा/कटाव रोधी कार्यों के साथ जलग्रहण क्षेत्र प्रबन्‍ध और जल विभाजक विकास कार्य आवश्यक हैं और इन्‍हें व्यापक तरीके से किया जाना चाहिए।
  • कटाव, प्रवाह और तलछट का जमाव नदी के प्राकृतिक नियमन कार्य हैं और नदी का तलछट संतुलन बनाए रखा जाना चाहिए।
  • नदियों के प्रवाह में बिना किसी बाधा के बाढ़ के लिये पर्याप्त मैदान (पार्श्व संपर्क) प्रदान किया जाना चाहिए।
  • 'गाद हटाने' की बजाय "गाद के लिये रास्ता दें" की रणनीति अपनायी जानी चाहिए।
      पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के रेत खनन के दिशानिर्देशों के अलावा गंगा नदी में गाद हटाने के कार्यों के विशिष्ट संदर्भ में समिति ने निम्‍नलिखित जीएसआई दिशानिर्देशों का सुझाव दिया है, जो वैधानिक हैं:
  1. गंगा नदी जलविज्ञान, तलछट और प्राकृतिक नदी तल तथा तट के झुकाव के अनुरूप स्‍वयं का संतुलन हासिल करने का प्रयास करती है। बाढ़ के स्तर को नियंत्रित करने के लिए नदी के साथ बाढ़ के लिये पर्याप्त मैदान और झीलें उपलब्‍ध कराना आवश्‍यक है। बाढ़ के मैदान पर किसी भी प्रकार के अतिक्रमण, झीलों का सुधार या नदी से झीलों का संपर्क काटने से बचना चाहिए, बल्कि आस-पास की झीलों/गड्डों से गाद हटाकर उनकी भंडारण क्षमता बढ़ाई जा सकती है। झीलों से गाद इस तरह हटाई जानी चाहिए कि तलछट की निरंतरता को कायम रखा जा सके और उसका वह तट नहीं कटना चाहिए, जो रिवर क्रॉसिंग के लिये असुरक्षित हो सकता है। स्थानीय स्तर पर पानी का अंर्तग्रहण या नदी प्रशिक्षण नीचे या उपर की ओर होता है।
  2. बैराज / पुल जैसे निर्माण कार्यों के कारण गाद भरने से नदी का रूख भटक जाता है। नदी की आकारिकी को प्रभावित किए बिना उचित मूल्यांकन के बाद संभवत: नदी प्रशिक्षण, बहाव रोक कर निर्माण कार्य और निर्माण स्‍थल के पास अतिरिक्त जलमार्ग के प्रावधान को आजमाया जा सकता है। विकास के बाद ऑब्सोबो झीलों के रूप में शेष बचे क्षेत्र का उपयोग अन्य प्रयोजनों के बजाय बाढ़ नियंत्रण के लिए किया जाना चाहिए।
  1. यदि संकुचन के कारण व्‍यापक गाद जमा हो रही हो, तो ऐसी स्थिति में पूर्व चयनित प्रवाह में गाद हटाने का काम काफी गहराई में किया जा सकता है, ताकि मुख्‍य धारा को सही दिशा दी जा सके। निकर्षण में निकली सामग्री को ऐसे वैकल्पिक प्रवाह में डंप किया जा सकता है, जिसे तट का कटाव टालने के लिए बंद करने का इरादा है। इसी तरह एक ऐेसे स्थिर प्रवाह के विकास पर ध्‍यान दिया जाना चाहिए, जो न तो अपतटीय या उपतटीय प्रवाह पर असर डालता हो। मेड़ एवं बांधों के आसपास गाद को निरंतर जमा करने के प्रयास किये जाने चाहिए।
  2. तटों के संरक्षण के लिए किये गये तटबंध, चपेट और नदी संबंधी उपायों से बाढ़ प्रभावित मैदानी इलाकों में प्रवाह नहीं जाना चाहिए और झीलों, बाढ़ वाले मैदानी इलाकों और अन्‍य पर्यावरण को नदी से अलग करके रखा जाना चाहिए।
  3. 5. किसी भी नदी से गाद हटाने की प्रस्‍तावित प्रकिया को जायज साबित करने की जरूरत है। इसके तहत गाद के कारण आई बाढ़ के बारे में स्‍पष्‍ट जानकारी देने के साथ-साथ बाढ़ में कमी लाने के वैकल्पिक उपायों की तकनीकी तुलना की जानी चाहिए, जिसके अंतर्गत ‘कुछ न करो’ अथवा प्रस्‍तावित गाद समाप्ति/निकर्षण अन्‍य विकल्‍प के रूप में होने चाहिए। इसके साथ ही तलछट प्रवाह के अध्ययन और रूपात्मक अध्‍ययन किये जाने चाहिए, ताकि रिवर क्रॉसिंग, जल ग्रहण, मौजूदा नदी तट/बाढ़ संरक्षण उपायों समेत नदी की अपतटीय एवं उपतटीय पहुंच पर कोई खास प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
  4. संगम वाले स्‍थानों, विशेष रूप से भारी गाद अपने साथ ले जाने वाली सहायक नदियों जैसे कि घाघरा, सोन इत्‍यादि से गाद हटाना आवश्‍यक हो सकता है, जिससे कि संगम वाले स्‍थलों को जल के लिहाज से दुरुस्‍त किया जा सके।
  5. मुख्‍य नदी गंगा और इसकी सहायक नदियों के ऊपरी प्रवाह में अवस्थित जलाशयों का संचालन कुछ इस तरह से किया जाना चाहिए, जिससे कि भारी गाद वाली प्रथम बाढ़ को बगैर भंडारण के ही गुजरने दिया जा सके और मानसून के बाद वाले चरणों में नदी के प्रवाह का संचयन केवल गैर-मानसून सीजन के दौरान इस्‍तेमाल के लिए किया जाना चाहिए। इसके लिए इष्‍टतम जलाशय परिचालन हेतु निर्णय सहायता प्रणाली की स्‍थापना करने के साथ-साथ मात्रात्‍मक दीर्घकालिक पूर्वानुमान की आवश्‍यकता पड़ेगी।
  6. नदियों में बाढ़ वाले मैदानी इलाकों में खेती-बाड़ी कुछ इस तरह से की जानी चाहिए, जिससे कि बाढ़ के पानी के प्रवाह में कोई अवरोध उत्‍पन्‍न न हो सके।
  7. धारा के प्रवाह में बेहतरी से जुड़े कार्य शुरू करने के लिए नदी के आकार संबंधी अध्ययन किये जाने चाहिए। इसके तहत यह सुनिश्चित किया जाएगा कि अपतटीय प्रवाह खोलने से गाद हटने का काम स्‍वत: हो सके। अपतटीय प्रवाह धीमी गति से होना चाहिए, ताकि वनस्पतियों और जीवों को नया आश्रय स्‍थल पाने के लिए पर्याप्‍त समय मिल सके।
  8. प्रस्‍ताव में पर्यावरणीय दृष्टि से स्‍वीकार्य और व्‍यावहारिक दृष्टि से समुचित गाद निपटान योजना का उल्‍लेख होना चाहिए। नदी में उपस्थित बजरी/रेत/गाद का समुचित उपयोग आवास, सड़कों, बांध एवं भूमि दुरुस्‍तीकरण कार्यों सहित निर्माण कार्यों में किया जा सकता है। किसी भी सूरत में गाद की वजह से नदी-तालाबों में प्रदूषण नहीं होना चाहिए और निपटान स्‍थलों के आसपास मौजूद वनस्पतियों और जीवों को कोई नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि हटाई गई गाद फिर से नदी में वापस न आ जाए।
  9. फरक्‍का बांध के आगे जमा गाद से जुड़े विशिष्‍ट मुद्दों को ध्‍यान में रखते हुए यह सुझाव दिया गया है कि वहां पर बनी उथली जगहों से गाद हटाई जा सकती है/निकर्षण किया जा सकता है और इस दौरान इसके आसपास चल रहे नदी प्रशिक्षण कार्यों को अवश्‍य ही ध्‍यान में रखा जाना चाहिए। हटाई गई तलछट का उपयोग फरक्‍का फीडर नहर की फिर से ग्रेडिंग किये जाने और बांध संबंधी तालाब के चारों ओर बने तटबंधों को मजबूत करने में किया जा सकता है। आवश्‍यक अध्‍ययन करने के बाद उपतटीय स्‍थल से अपतटीय स्‍थल की ओर तलछट का प्रवाह जारी रखने के लिए इसे तेज गति से बाहर निकालने का काम किया जा सकता है। बांध संबंधी तालाब से गाद हटाने/निकर्षण के कार्यों से बांध को कोई ढांचागत क्षति नहीं होनी चाहिए, जिसके लिए अपतटीय स्‍थल के अत्‍यधिक कटाव से बचने की जरूरत है। इसे ध्‍यान में रखते हुए निकर्षण के कार्य को नदी-तालाब के मूल तल अथवा उससे ऊपर की ओर ही सीमित रखा जाएगा।
  10. बांध/तटबंध के ढांचों के अपतटीय स्‍थल तक तलछट का सुरक्षित ढंग से आगमन सुनिश्चित करने के लिए आवश्‍यक इंतजाम करने के बारे में अध्‍ययन किया जाना चाहिए, जिससे कि तलछट संबंधी संतुलन को बरकरार रखा जा सके।
  11. गंगा नदी से गुजरने वाले किसी भी पुल, जिसके कारण बड़े पैमाने पर बहाव (सामान्‍य गहराई के एक फीसदी से ज्‍यादा) उत्‍पन्‍न होता है, में कुछ इस तरह से बदलाव किया जाना चाहिए, जिससे कि बहाव में कमी सुनिश्चित हो सके। इससे तलछट जमा होने के साथ-साथ अपतटीय स्‍थल पर तटों का कटाव कम हो सकेगा।
  12. निकर्षण/गाद हटाने/खनन गतिविधियों से कुछ प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकते हैं, जैसे कि (क) नदी तल का नीचे की ओर जाना (ख) तट का कटाव (ग) प्रवाह का चौड़ा होना (घ) नदी प्रवाह में उथले जल स्‍तर का नीचे की ओर आना (ड) नदी के आसपास स्थित उथले जल स्‍तर का नीचे की ओर आना (च) पुलों, पाइपलाइनों, जेटी, बांधों, मेड़ इत्‍यादि की ढांचागत मजबूती में कमी आना (छ) पर्यावरणीय नुकसान होना।
  13. जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय के अधीनस्‍थ कार्यालय गंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग और केन्‍द्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री की अगुवाई वाले गंगा बाढ़ नियंत्रण बोर्ड के सचिवालय एवं कार्यकारी प्रकोष्‍ठ, जिसमें गंगा नदी बेसिन राज्‍यों के मुख्‍यमंत्री और नीति आयोग (पूर्ववर्ती योजना आयोग) के सदस्‍य भी शामिल हैं, को गंगा नदी में तलछट प्रबंधन के बारे में आवश्‍यक अध्‍ययन करने और इसके साथ ही गंगा नदी के समस्‍त उप बेसिनों के लिए तैयार की गई अपनी व्‍यापक नीतियों में तलछट प्रबंधन रणनीतियों को शामिल करने का अतिरिक्‍त दायित्‍व सौंपा जा सकता है। इन एकीकृत योजनाओं का उपयोग गंगा नदी से जुड़े कार्यों के लिए पर्यावरणीय मंजूरी के प्रस्‍तावों पर विचार करने हेतु केन्‍द्रीय, राज्‍य और जिला स्‍तरीय प्राधिकरणों के लिए मूल दस्‍तावेजों के रूप में किया जा सकता है।

Friday, May 5, 2017

जवाहर नगर को आदर्श वार्ड बनाएगा परिवर्तन

इसमें कोई शक नहीं कि मोदीजी का स्वच्छता अभियान सर चढ़ कर बोल रहा है| 30 अप्रैल को जवाहर नगर के लोगों की सुबह सफाई के नज़ारे के साथ हुई| सब रोगों की एक दवाई, क्षेत्र में हो साफ़ सफाई”, “गांधी जी ने दिया संदेश, स्वच्छ रखो अपना देश”, हमसब का एक है सपना, सुंदर स्वच्छ नगर हो अपना”, “अपना देश साफ़ हो, इसमें सब का हाथ हो”, लक्ष्मी जी का कहना है, गंदगी में नही रहना है”, आदि श्लोगन नारों की शक्ल में गूँजते भी रहे| गांधी जी के सपने, मोदी जी के प्रयास और संस्था परिवर्तन के संकल्प स्वच्छ भारत मिशन-2020 के तहत आज संस्था परिवर्तन का वार्ड-43 जवाहरनगर के लोगों ने आदर्श वार्ड बनाने का महाअभियान प्रारम्भ किया| अभियान के अंतर्गत उक्त नजारा रहा जन जागरूकता के एक रोड शो का| संस्था के मिनी ट्रक्स और रिक्शो की टोली के साथ 40 से अधिक सफाई कर्मी शामिल हुए| मानव श्रंखला बना लोगो को जागरूक किया गया| साथ ही क्षेत्रीय लोगो से मिल उनसे निवेदन किया गया की कृपया संस्था परिवर्तन के द्वारा स्थापित कूड़े के कंटेनर्स में ही कूडा डाले| ऐसा करने पर  संस्था के कर्मचारियों और उनके वाहनों एवं संसाधनों के द्वारा निशुल्क उठा लिया जाएगा| इसके लिए संस्था सदस्य और क्षेत्रीय लोगों ने अलग-अलग समूहों में छोटी-छोटी गलियों में  घर-घर जाकर लोगो से  मुलाकात की|
परिवर्तन संस्था और क्षेत्रीय नागरिकों ने मिलकर जवाहर नगर को स्वच्छता और राजकाज के मामले में आदर्श वार्ड बनाने का संकल्प लिया| साथ ही एक वार्ड स्तरीय समिति भी गठित करने का प्रस्ताव पेश हुआ| जिसे स्थानीय पार्षद अलोक दुबे के नेतृत्व में आगे बढाया जायेगा| 

कार्यक्रम की एक और उपलब्धि क्षेत्रीय जनता का सहयोग और श्रमदान भी रही| जिसके बाद कई क्षेत्रीय नागरिको ने 02 घंटा साप्ताहिक श्रमदान की शपथ भी ली| संस्था के द्वारा की गयी पहल में सदा अपना सहयोग देने को भी आगे आए और इस पूरे महाअभियान की सराहना भी की| संस्था के कर्मचारियों द्वारा मुख्य मार्गो और उनमे मौजूद नाले-नालियों की सफाई भी की गयी और जगह जगह लगे कूड़े के ढेरो को भी उठा लिया गया, जिस पर क्षेत्रीय जनता ने जगह जगह तालियों की गड़गड़ाहट से सभी का शुक्रिया और अभिवादन भी किया| रोड शो आयोजन का संयोजक कर्नल राकेश दीक्षित के नेतृत्व में किया गया| साथ ही परिवर्तन संस्था के कई वरिष्ठ सदस्यों में कैप्टन सुरेशचन्द्र त्रिपाठी, अनिल गुप्ता, संदीप जैन, राजेश ग्रोवरअनूप द्वेदी, प्रदीप खत्री सरीखे समाजसेवी मौजूद रहे|