Friday, April 8, 2016

गंगा की व्यथा-कथा: नदिया के डॉक्टरों ने लगाई सरसैया घाट पर पंचायत

कानपुर|
 नदिया के लिए डाक्टरी की जरुरत पड़ी है| खबर है कि शहर के विद्वानों ने मुहिम छेड़ी है कि नदी स्वास्थ्य सूचकांक कैसे बने| सरसैया घाट के किनारे लगी पंचायत के लिए सवाल थे कि नदी के स्वास्थ्य का परिक्षण कैसे हो? कैसे कहा जाए कि किसी नदी की हालत नाजुक है या बेहतर| कैसे बयान किया जाए कि अमुक नदी की सेहत का राज क्या है? ये सवाल शहर के लोगों को भले ही नागवार लगते हों| लेकिन इन्हीं सवालों के जवाब में डब्लूडब्लूऍफ़ के राजेश बाजपेई ने नदी स्वास्थ्य सूचकांक की परिकल्पना रखी| साथ ही बताया कि ग्लोबल एनजीओ विश्व वन्यजीव फण्ड के नेतृत्व में गंगा और दुनिया भर की नदियों के लिए नदी स्वास्थ्य सूचकांक बनाने की कवायद शुरू हुई है| विशेषज्ञ के तौर राजेश नदी स्वास्थ्य के मानकों में जरुरी बताते हैं, नदी में पानी की मात्रा को, नदी की धारा के बहाव को, रासायनिक प्रदूषकों की मात्रा को यहाँ तक नदी के किनारे रहने वाले लोगों की सोच और उनके नदी के साथ जुड़ाव को| इन सबके साथ ही साथ हरियाली और जैवविविधता भी नदी के स्वास्थ्य के लिए बहुत ही जरुरी मानते है| कार्यक्रम में पूर्व पार्षद मदन लाल भाटिया, आईआईटी के प्रो. राजीव सिन्हा, श्रमिक भारती से विनोद दुबे, इकोफ्रेंड्स से राकेश जयसवाल, गंगा एलायंस से रामजी भाई, जाह्नवी बाजपेई समेत कानपुर विश्वद्यालय के सामाजिक कार्य विभाग के युवाओं के साथ तमाम गणमान्य लोग उपस्थित रहे|
उपस्थित गणमान्य लोगों के बीच सवाल उठे कि नदिया के खास किनारे वाले नाविक, निषाद, माली, मांझी और पुजारी भी गंगा के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए कार्यक्रम से कैसे जुड़ सकते हैं तो इस पर कुछ वाजिब जवाब मिल नहीं सका| सरसैया घाट पर समुदायों के बीच चर्चा रही कि नदिया की फिक्र करने वाले नदिया के बेटों की फिक्र क्यों नहीं कर पा रहे|
खबर है कि पानी की शुद्धता की जांच करने के अंग्रेजी तरीकों बीओडी, सीओडी, टीडीएस शायद कारगर साबित नहीं हुए इसलिए आईआईटी कानपुर वाले पानी की शुद्धता की जांच के लिए हवाई सर्वेक्षण की जुगत लगा रहे हैं| प्रोफ़ेसर साहेब बताते हैं कि ऊंची क्षमता वाले कैमरे से दूर से ही पता चल जाएगा कि प्रदूषण कितना है| पानी की गुणवत्ता कैसी है|

आम लोग विद्वानों द्वारा धरती और नदियों को संसाधन कहने का क्या अर्थ लगाते हैं? अकादमिक शब्दों में जवाब मिलेगा उत्पादन और उपभोग की श्रृंखला में एक अवयव| लेकिन असलियत तो एकेडेमिया से कोसों दूर ही रही है| सच तो ये हैं कि शहरी आम आदमी के लिए जमीन के असली अर्थ रियल स्टेट वाले तय करते हैं, तो नदी और पानी के मूल्य से जुड़े अर्थशास्त्र कंपनियों के हवाले से मिलते हैं| फिर भी उम्मीद की जाती है कि स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय भी जल जंगल और जमीन के मसलो को गंभीरता से लेकर कुछ रचना कर सकेंगे|