Wednesday, June 6, 2012

सरकारी कर्मकांड, गंगा भक्त, आम जनता और गंगा संस्कृति

जून, 2112 की शाम । वाराणसी के गंगा रोड के किनारे बीयर बार की दुकान पर बैठे पाँच युवा मित्र। एक-एक बोतल पी लेने के बाद आपस में चहकते हुए………

तुमको पता है ? ये जो सामने 40 फुट चौड़ी गंगा रोड है न ! वहां आज से 100 साल पहले तक गंगा नदी बहती थी !

हाँ, हाँ पता है। आज भी बहती है। सड़क के नीचे नाले के रूप में।

सच्ची ! आज भी बहती है ? पहले नदी बहती थी तो उस समय पानी बीयर से सस्ता मिलता होगा !

बीयर से सस्ता ! अरे यार, बिलकुल मुफ्त मिलता था। चाहे जितना नहाओ, चाहे जितना निचोड़ो। और तो और मेरे बाबा कहते थे कि उस जमाने में यहाँ, जहाँ हम लोग बैठ कर बीयर पी रहे हैं, गंगा आरती हुआ करती थी।

ठीक कह रहे हो। मेरे बाबा कहते हैं कि यहां से वहाँ तक इस किनारे जो बड़े-बड़े होटल बने हैं न, लम्बे-चौड़े घाट हुआ करते थे और नदी में जाने के लिए घाट किनारे पक्की सीढ़ियाँ बनी थीं।

तब तो नावें भी चलती होगी नदी में ? गंगा रोड के उस किनारे जो लम्बा ब्रिज है वो दूसरा किनारा रहा होगा क्यों ?

और नहीं तो क्या दूर-दूर तक रेतीला मैदान हुआ करता था, जहाँ लोग नैया लेकर निपटने जाते थे और लौटते वक्त नाव में बैठ कर भांग बूटी छानते थे।

भांग-बूटी ? बीयर नहीं पीते थे !

चुप स्साले ! तब लोग गंगा नदी को माँ की तरह पूजते थे। नैया में बैठकर कोई बीयर पी सकता था भला ?

उहं ! बड़े आए माँ की तरह मानने वाले। क्या तुम यह कहना चाहते हो कि माँ मर गई और हमारे पूर्वज देखते रह गये ? कुछ नहीं किया ?

हमने इतिहास की किताब में पढ़ा है। राजा भगीरथ गंगा को धरती पर लाये थे।

यह नहीं पढ़ा कि हमारे दादाओं, परदादाओं ने पहले नदी में इतना मल-मूत्र बहाया कि वो गंदी नाली बन गई और बाद में गंदगी छुपाने के लिए लोक हित में उस पर चौड़ी सड़क बना दी !

बड़े शातिर अपराधी थे हमारे पुर्वज। माँ को मार कर अच्छे से दफन कर दिये।

अरे यार ! गंदी नाली को रखकर भी क्या करते ? अब तो ठीक है न। नाली नीचे, ऊपर सड़क। विज्ञान का चमत्कार है।

विज्ञान का चमत्कार ! इतना ही चमत्कारी है विज्ञान तो क्यों नहीं गंगा की तरह एक नदी निकाल देता ? बात करते हो ! पानी का बिल तुम्हीं देना मेरे पास पैसा नहीं है । बाबूजी से मुश्किल से दो हजार मांग कर लाया थो वो भी खतम हो गया। सौ रूपया गिलास पानी, वो भी खारा !

जानते हो ! मैने पढ़ा है कि सौ, दो सौ साल पहले गंगा नदी का पानी अमृत हुआ करता था। जो इसमें नहाता था उसको कोई रोग नहीं होता था। तब लोग नदी के पानी को गंगाजल कहते थे। पंडित जी, गंगा स्नान के बाद कमंडल या तांबे-पीतल के गगरे में भरकर ठाकुर जी को नहलाने के लिए या पूजा-आचमन के लिए ले जाते थे। सुना है दूर-दूर से तीर्थ यात्री आते और गंगाजल को बड़ी श्रद्धा से प्लास्टिक के बोतल में रख कर ले जाते।

हा…हा…हा…दूर के यात्री ! प्लास्टिक के बोतल में गंगाजल घर ले जाते थे ! घर ले जाकर सड़ा पानी पीते और मर जाते थे । क्या बकवास ढील रहे हो ! एक बोतल बीयर ही फुल चढ़ गई क्या ?

पागल हो ! जब कुछ पता न हो तो दूसरे की बात को ध्यान से सुननी चाहिए। तुम्हे जानकर आश्चर्य होगा कि गंगाजल कभी सड़ता ही नहीं था। उसमें कभी कीड़े नहीं पड़ते थे।

क्या बात करते हो ! गंगाजल में कभी कीड़े नहीं पड़ते थे ? इसी पानी को घर ले जाओ तो फ्रेशर से फ्रेश किये बिना दूसरे दिन पीने लायक नहीं रहता और तुम कह रहे हो कि गंगाजल में कभी कीड़ा नहीं पड़ता था !

हाँ मैं ठीक कह रहा हूँ। गंगा में पहाड़ों से निकलने वाली जड़ी-बूटियाँ इतनी प्रचुर मात्रा में घुल जाती थीं कि उसका पानी कभी सड़ता ही नहीं था। माँ के जाने के बाद यह धरती अनाथ हो गई है।

इससे भी दुःख की बात तो यह है कि हम अपन संस्कृति को इतनी जल्दी भूल चुके हैं !

ठीक कह रहे हो। हमारी सरकारों ने भी संस्कृति को मिटाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। तुम्हें पता है एक समय था जब वाराणसी में तीन-तीन नदियाँ बहती थीं। वरूणा, अस्सी और गंगा।

हाँ मैने सुना है। बनारस का नाम वाराणसी इसीलिए पड़ा कि यह वरूणा और अस्सी नदी के बीच बसा था। दायें बायें अस्सी-वरूणा और सामने गंगा नदी।

कल्पना करो…. तब यह कितना रमणीक स्थल रहा होगा !

पहले अस्सी नदी के ऊपर लोगों ने अपने घर बनाये फिर वरूणा नदी को पाट कर लिंक रोड निकाल दिया। गंगा नदी तो तुम्हारे सामने है ही….गंगा रोड।

इस सड़क का नाम क्यों गंगा रोड रख दिया ?

हा हा हा…हमारी सरकार चाहती है कि है जब लोग यहाँ बैठें तो बीयर पी कर थोड़ी देर इस नाम पर सोंचे और अपनी संस्कृति के विषय में आपस में चर्चा करें।

हाँ। सरकारें, संस्कृति की रक्षा ऐसे ही किया करती हैं।

गंगा बैराज कानपुर : गंगा के अस्तित्व को चुनौती

गंगा बैराज शहर के विस्तारीकरण की एक महत्वकांक्षी योजना जैसा प्रतीत होता है. कहना मुश्किल है कि रिवर व्यू अपार्टमेन्ट और फूलों फव्वारों वाले पार्कों की तैयारी में लगा विकास प्राधिकरण शायद पुराने कानपूर, तिवारी घाट, रानी घाट और साथ लगे हुए हिस्सों को बंद आँखों से देखता है या कर्ज देने वालों की शर्त है कि उस तरफ न देखा जाए. रामकी एनवायरो इंजिनीयर्स और जियो मिलर जैसी कम्पनियाँ किस श्रद्धा के साथ गंगा सेवा में जुडी हैं यह तो मौके की मुआयना करने वालों को नज़र आ जाता है. अंतर निहित उद्देश्यों और दूरगामी परिणामों की बात न भी करें तो भी यह अनायास ही नज़र आ जाता है कि सरकारी परियोजनाएं सफ़ेद हाथी बनती हैं तो कैसे? संवाद करने से ऐसा लगता है कि स्थानीय लोगों को गंगा बैराज के नफे नुकसान से कोई सरोकार नहीं न ही सरकार या सरकारी तंत्र को इसकी को परवाह है.. कच्चे पक्के मकान, टूटी सड़के, बजबजाती नालियाँ, और गंगा जी में प्रत्यक्ष प्रवाहित होते नालों को देख कर तो कतई नहीं कहा जा सकता है कि इस परियोजना का उद्देश्य गंगाजी की निर्मलता या जनसामान्य के भले के लिए किया गया है. ये तो तात्कालिक परिस्थितियां हैं. साथ ही जल प्रवाह और बैराज के फाटकों कि स्थिति देखें तो और स्पष्ट हो जाता है कि गंगा जी के पारिस्थिकीय तंत्र और उसके प्रवाह में कोई सम्बन्ध है या नहीं ये शायद शासक वर्ग और उनके तकनीकी विशेषज्ञों क समझ के लिए दूर की कौड़ी है. जल उपलब्धता इतनी न्यून है की सिर्फ एक फाटक से निहायत प्रदूषित पीले जल की. निकासी करके छद्म प्रवाह की स्थिति बनती है. देख कर समाज नहीं आता है की यही शहर के प्रारंभ में यह हालत है तो शहर के पेय जल और थोड़ी बहुत सिंचाई के बाद यदि 19 नालों का पानी न मिलाया जाए तो कानपुर के दूसरे दूसरे छोर पर गंगा एक नदी के रूप में कैसे पहुंचेगी ? अब कानपुर में यह हालत है तो इलाहबाद और बनारस में गंगा एक नदी के रूप में पहुँचती है या नालों के एक समग्र प्रवाह के रूप में इसकी अनदेखी कैसे की जा सकती है.. वैसे तो कानपुर के एक छोर से दूसरे छोर तक हालत विशेष रूप से किनारों पर रहने वाले पीड़ित जनों की स्थिति लगभग एक जैसी है लेकिन शहर के ही भद्र जनों और गंगा भक्तो की समझ कैसी है गंगा जी का अस्तित्व इस पर भी बहुत निर्भर करता है.