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Showing posts from June 4, 2012

इस विचित्र देश के कुछ दुर्लभ सीन जिस देश में गंगा बहती है-I

हमारा देश एक विचित्र देश है. जितना विचित्र हमारा देश है. उससे कहीं अधिक विचित्र हमारे नेता लोग हैं. कोई ऐसा मुद्दा जिस में कुछ भी राजनीति करने की गुंजाइश हो उसको हमारे नेता लोग किस तरह लपकते हैं यह व्यंग उसका उदाहरण हैं. पेश है एक ऐसा ही मुद्दा - दिनांक १६ अगस्त - कलमाड़ी ने सुप्रीम कोर्ट में जमानत के लिए अपील की. उनका कहना है की वह उन्होंने जो भी पाप किये है उनको वह गंगा में नहाकर धोना चाहते हैं.  इसको लेकर अपने समर्थन में उन्होंने तमाम ग्रंथों और पुराणों का हवाला दिया.
दिनांक १७ अगस्त - १२ बजे -  सुप्रीम कोर्ट ने धर्म कर्म में उनकी आस्था को देखते हुए उनकी जमानत ४ दिनों के लिए मंजूर की. (क्यूंकि कोर्ट पहले भी आस्था के आधार पर अपना फैसला एक और मुकदमे में दे चुकी है.)

१ बजे- प्रधानमंत्री ने गंगा की सफाई के लिए १००० करोड़ की अतिरिक्त राशि मंजूर की.

२ बजे -  येदीयुरप्पा ने भी कर्नाटक से लेकर हरिद्वार तक की यात्रा का ऐलान किया.

३ बजे -  कलमाड़ी ने समस्त भ्रष्ट कांग्रेसियों से अपने पाप धोने की अपील की. उन्होंने कहा कि वह दिल्ली से हरिद्वार तक पैदल यात्रा करेंगे. उन्होंने समस्त कांग्रेसी नेताओं…

सरकारी कर्मकांड, गंगा भक्त, आम जनता और गंगा संस्कृति

जून, 2112 की शाम । वाराणसी के गंगा रोड के किनारे बीयर बार की दुकान पर बैठे पाँच युवा मित्र। एक-एक बोतल पी लेने के बाद आपस में चहकते हुए………

तुमको पता है ? ये जो सामने 40 फुट चौड़ी गंगा रोड है न ! वहां आज से 100 साल पहले तक गंगा नदी बहती थी !

हाँ, हाँ पता है। आज भी बहती है। सड़क के नीचे नाले के रूप में।

सच्ची ! आज भी बहती है ? पहले नदी बहती थी तो उस समय पानी बीयर से सस्ता मिलता होगा !

बीयर से सस्ता ! अरे यार, बिलकुल मुफ्त मिलता था। चाहे जितना नहाओ, चाहे जितना निचोड़ो। और तो और मेरे बाबा कहते थे कि उस जमाने में यहाँ, जहाँ हम लोग बैठ कर बीयर पी रहे हैं, गंगा आरती हुआ करती थी।

ठीक कह रहे हो। मेरे बाबा कहते हैं कि यहां से वहाँ तक इस किनारे जो बड़े-बड़े होटल बने हैं न, लम्बे-चौड़े घाट हुआ करते थे और नदी में जाने के लिए घाट किनारे पक्की सीढ़ियाँ बनी थीं।

तब तो नावें भी चलती होगी नदी में ? गंगा रोड के उस किनारे जो लम्बा ब्रिज है वो दूसरा किनारा रहा होगा क्यों ?

और नहीं तो क्या दूर-दूर तक रेतीला मैदान हुआ करता था, जहाँ लोग नैया लेकर निपटने जाते थे और लौटते वक्त नाव में बैठ कर भांग बूटी छानते थे।

भांग-ब…

गंगा बैराज कानपुर : गंगा के अस्तित्व को चुनौती

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गंगा बैराज शहर के विस्तारीकरण की एक महत्वकांक्षी योजना जैसा प्रतीत होता है. कहना मुश्किल है कि रिवर व्यू अपार्टमेन्ट और फूलों फव्वारों वाले पार्कों की तैयारी में लगा विकास प्राधिकरण शायद पुराने कानपूर, तिवारी घाट, रानी घाट और साथ लगे हुए हिस्सों को बंद आँखों से देखता है या कर्ज देने वालों की शर्त है कि उस तरफ न देखा जाए. रामकी एनवायरो इंजिनीयर्स और जियो मिलर जैसी कम्पनियाँ किस श्रद्धा के साथ गंगा सेवा में जुडी हैं यह तो मौके की मुआयना करने वालों को नज़र आ जाता है. अंतर निहित उद्देश्यों और दूरगामी परिणामों की बात न भी करें तो भी यह अनायास ही नज़र आ जाता है कि सरकारी परियोजनाएं सफ़ेद हाथी बनती हैं तो कैसे? संवाद करने से ऐसा लगता है कि स्थानीय लोगों को गंगा बैराज के नफे नुकसान से कोई सरोकार नहीं न ही सरकार या सरकारी तंत्र को इसकी को परवाह है.. कच्चे पक्के मकान, टूटी सड़के, बजबजाती नालियाँ, और गंगा जी में प्रत्यक्ष प्रवाहित होते नालों को देख कर तो कतई नहीं कहा जा सकता है कि इस परियोजना का उद्देश्य गंगाजी की निर्मलता या जनसामान्य के भले के लिए किया गया है. ये तो तात्कालिक परिस्थितियां हैं.…

पर्यावरण सम्बन्धी मुकदमेबाजी का नया युग

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Geo-politics of environmental privatization :Green or suspected green? भारत एक ऐसा देश है, जिसका पर्यावरण संबंधी आंदोलनों, ज़मीनी स्तर पर सक्रियता और उत्तरदायी उच्च न्यायपालिका का अपना समृद्ध इतिहास रहा है. ऐसे देश में 2011 का वर्ष पर्यावरण संबंधी मुकदमेबाज़ी का अत्यंत महत्वपूर्ण वर्ष अर्थात मील का पत्थर साबित हुआ है. यद्यपि पर्यावरण संबंधी मुक़दमेबाज़ी पिछले तीन दशकों में काफ़ी बढ़ गई है, लेकिन पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना के कारण 2011 का वर्ष फिर भी काफ़ी विशिष्ट है. केवल यही एकमात्र तथ्य नहीं है कि इसकी स्थापना की गई, क्योंकि इससे पहले भी ऐसे ही एक अधिकरण की स्थापना की गई थी, जो इससे कम शक्तिशाली था. लेकिन जिस तरह से उच्चतम न्यायालय द्वारा पर्यावरण और वन मंत्रालय को इस दिशा में सक्रियता से प्रेरित किया गया, वह इसकी विशेषता बन गई. राष्ट्रीय हरित अधिकरण का पहला क़दम और इसे पूरी तरह से स्थापित करने का निरंतर संघर्ष काफ़ी महत्वपूर्ण रहा है. पर्यावरण संबंधी मामलों पर केंद्रित और गठित राष्ट्रीय हरित अधिकरण के क़ानून को जून, 2010 में राष्ट्रपति की स्वीक…

DEATH OF RIVER PANDU IN KANPUR

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Residents of more than 50 villages situated along the Pandu river, a tributary of Ganga which passes through Kanpur, are a disgruntled lot. They are bearing the brunt of the rampant pollution caused by the draining of ash slurry from Panki Power Thermal Plant and effluents thrown by a number of industries including some units of Ordinance into river Pandu. Even worse, tonnes of sewage are also fouling its water. No wonder, Pandu river which was known for its crystal clear water two decades back has turned black. It also stinks. The magnitude of the contamination can be gauged from the fact that many of the people exposed to the water are suffering from a host of skin problems. Even though the deplorable condition of river water has been brought to the notice of the authorities concerned, no action has been taken in this regard. And the poisoning of Pandu continues. The biggest villain of the piece is the Panki Thermal Power Plant. According to sources, the plant uses around 3,000 ton…

‘जोड़ने’ में न टूटें लक्ष्मण रेखाएं

Source:   गांधी मार्ग, मई - जून 2012 हिमालय का नक्शा ऊपर से देखें तो गंगा और यमुना का उद्गम बिल्कुल पास-पास दिखाई देगा लेकिन यह पर्वत का भूगोल ही है कि दोनों नदियों को प्रकृति ने अलग-अलग घाटियों में बहाया और फिर बहुत धीरज के साथ पर्वत को काट-काटकर प्रयाग तक पहुंच कर इनको मिलाया। न्याय देने वाला पक्ष-विपक्ष की लंबी-लंबी दलीलें सुनता है और तब वह नीर, क्षीर, विवेक के अनुसार फैसला सुनाता है। दूध का दूध और पानी का पानी। लेकिन नदी जोड़ो प्रसंग में अदालत ने दोनों बार दूध भुला दिया और पानी को पानी से जोड़ने का आदेश दे दिया है। लगता है लक्ष्मण रेखाएं तोड़ने का यह स्वर्ण-युग आ गया है। जिसे देखो वह अपनी मर्यादाएं तोड़कर न जाने क्या-क्या जोड़ना चाहता है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने नदी जोड़ने के लिए सरकार को आदेश दिया है। एक समिति बनाने को कहा है और उसकी संस्तुतियां भी एक निश्चित अवधि में सरकार के दरवाजे पर डालने के लिए कहा है और शायद यह भी कि सरकार संस्तुतियां पाते ही तुरंत सब काम छोड़कर देश की नदियां जोड़ने में लग जाए! यह दूसरी बार हुआ है। इससे पहले एनडीए के समय में बड़ी अदालत ने अटलजी की सरकार क…