Monday, March 26, 2012



माटू जनसंगठन
ग्राम-छाम, पथरी भाग-4 व पो0  सुभाषगढ़  वाया लक्सर  जिला-हरिद्वार, उत्तराखंड
पत्र व्यवहार का पता: डी 334/10, गणेश नगर, पाण्डव नगर काॅम्पलेक्स, दिल्ली-110092
<matugnaga.blogspot.com>फोन-09718479517--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
प्रैस विज्ञप्ति                                                                                                                                                                               26-3-2012
‘‘बड़े बांध नहीः स्थायी विकास चाहिये‘‘


उत्तराखंड राज्य में बड़े बांधो की नही वरन् पहाड़ के लिये स्थायी विकास हेतु प्राकृतिक संसाधनों के जनआधारित उपयोग की जरुरत है। राज्य में नयी सरकार के नये मुख्यमंत्री ने राज्य में उर्जा उत्पादन को बढ़ाने की बात की है। यह ब्यान अपने में एक भय दिखाता है। इसका अर्थ जाता है कि बांधो पर नयी दौड़ शुरु होगी। हाल ही में 14 मार्च से 22 मार्च तक ‘वैश्विक बड़े बांध विरोधी सप्ताह’ पर माटू जनसंगठन ने उत्तराखंड में विभिन्न स्थानों पर बड़े बांधों के विरोध में प्रदर्शन  किया।

अलकनंदा गंगा पर निर्माणाधीन विष्णुगाड-पीपलकोटी बांध (444 मेगावाट) प्रभावितों ने पीपलकोटी शहर में जुलुस निकाला और अलकनंदागंगा को स्वतंत्र रखने के लिये संघर्ष को तेज करने का संकल्प लिया। हाल ही में इस परियोजना को विश्व बैंक से कर्जा मंजूर हुआ है। 24 दिसंबर को विश्व बैंक के मिशन का भी लोगो ने 3 घंटे घेराव करके अपना विरोध प्रकट किया

टौंस घाटी में जखोल-संाकरी बांध (51 मेगावाट) प्रभावित क्षेत्र में भी बड़ा जुलुस प्रर्दशन हुआ यह क्षेत्र गोविंद पशु विहार में आता है। यहंा लोगो के पांरम्परिक हक-हकूको पर पाबंदी है। किन्तु बांध की तैयारी है। जखोल गांव 2,200 मीटर की उंचाई पर है और भूस्खलन से प्रभावित है। बंाध की सुरंग इसके नीचे से ही प्रस्तावित है। यहंा लोगो ने मई 2011 से टैस्टिंग सुरंग को बंद कर रखा है।

मुख्यमंत्रीजी के ब्यान पर माटू जनसंगठन ने उत्तराखंड के बांधों की स्थिति पर गहरी चिंता प्रकट करते हुये, बड़े बांधो पर सरकारी दौड़ पर प्रश्न उठाया है। जिस तरह बिजली उत्पादन के लिये पर्यावरण नियमों और नदी घाटी के निवासियों के हक-हकूकों को एक तरफ करके नये बांधों को जल्दी-जल्दी बनाने की कोशिश हो रही है। वह किसी भी तरह से उत्तराखंड के भविष्य के लिये सही नही है। पुराने बांधो की कमियों और उनके नुकसानो पर कोई चर्चा तक नही है।

पर्यावरण एंव वन मंत्रालय द्वारा किसी भी नदी में मक डालने पर पाबंदी है। मक को कही पर भी रखे जाने के लिये भी नियम मंत्रालय द्वारा दिये गये है। किन्तु राज्य में कही भी इसका पालन नही हो रहा है। टिहरी बांध परियोजना जिसमें टिहरी बांध, पंप स्टोरेज प्लांट व कोटेश्वर बांध आते है। इनकी पर्यावरण स्वीकृति 19 जुलाई 1990 को हुई थी जिसमें शर्त संख्या 3.7 में भागीरथी प्रबंध प्राधिकरण बनाने के लिये थी। इस प्राधिकरण का काम पूरी घाटी के प्रबंधन का होना चाहिये। किन्तु नदी को जिस तरह कचरा फंेकने की जगह बना दिया गया है वह शर्मनाक है। केंद्रीय पर्यावरण एंव वन मंत्रालय, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और प्राधिकरण की भी पूरी तरह जिम्मेदार है। दोनो की ओर से कोई निगरानी नही हो रही है। इसके लिये बांध कंपनी टिहरी जलविद्युत निगम {टीएचडीसी} व बांध ठेकेदारों पर कार्यवाही होनी चाहिये। किन्तु टीएचडीसी को नये बांधों का ठेका दिया जा रहा है। विश्व बैंक ने टीएचडीसी को अलकनंदा गंगा पर विष्णुगाड-पीपलकोटी बांध के लिये पैसा दिया है। वहंा भी यही हाल है।
भागीरथीगंगा पर जिस लोहारीनाग-पाला बांध को रोका गया था वहंा पर बन चुकी सुरंग को ऐसे ही छोड़ दिया है। मकानों में आई दरारों, सूखे जलस्त्रोंतो के लिये कोई उपाय नही किये गये है। मनेरी-भाली चरण दो में बांध चालू होने के बाद भी जलाशय पूरा नही भरा जा सका चूंकि जलाशय से नई डूब आई। डूब का क्षेत्र पहले मालूम ही नही था। इसी बांध की सुरंग से कितने ही गांवों के जल स्त्रोत सूख गये। बांध बनने के बाद इसका विद्युतगृह टिहरी बांध की झील में आ रहा है। यह बताता है कि अभियांत्रिकी व सर्वे कितने गलत है।
भागीरथीगंगा के बांधों से कभी भी पानी छोड़ने के कारण दसियों लोग डूब चुके है। अभी 18 फरवरी, 2012 को उत्तरकाशी में गंगा के बीच में दो बच्चे फंस गये थे। गंगा सर्दियों में सूखी नजर आती है। बांध कंपनियंा शाम को बिजली पैदा करने के लिये ही पानी छोड़ती है। नदी किनारे रहने वाले, नदियों से ही वचिंत हो गये है।
माननीय उच्च न्यायालय द्वारा 3 नवम्बर 2011 को एन. डी. जुयाल व शेखर सिंह की याचिका पर टीएचडीसी को टिहरी बांध विस्थापितों के पुनर्वास कार्य पूरा करने के लिये 102.99 करोड़ रुपये देने का निर्देश दिया है। जबकी सरकारें 2005 में ही पूर्ण पुनर्वास की घोषणा कर चुकी थी। अभी भी अलंकनंदागंगा पर बने पहले निजी बांध {जे.पी. कंपनी} की सुरंग से धंसे चाई गांव के लोगो का पुनर्वास नही हो पाया है।
मंदाकिनी घाटी में निर्माधीन सिंगोली-भटवाड़ी व फाटा-ब्योंग बांधों की निमार्णाधीन सुरंगो से त्रस्त, अपने जंगलो की रक्षा में खड़े लोगो को जेल भेजा जा रहा है। और बांध कंपनियों की निगरानी तक नही है।
पिंडर घाटी में जहंा लोगो ने बांध का विरोध किया, दो बार जनसुनवाई नही होने दी वहंा तीसरी बार बैरीकेट लगाकर जनसुनवाई की गई और तमाम उलंघनों के बाद भी स्थानीय प्रशासन और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने केंद्रीय मंत्रालय को गलत तथ्य पेश किये।
65 मीटर के बांध और 200 मेगावाट के लिये प्रस्तावित श्रीनगर परियोजना में 95 मीटर का बांध और 330 मेगावाट के लिये बन रही है। यह पर्यावरण मंत्रालय की बंद आंखो वाली स्वीकृति प्रक्रिया का प्रमाण है।
ये सब कुछ उदाहरण मात्र है कि कैसे बांधों से विकास के भ्रम को आगे बढ़ाया जा रहा है। 

रोजगार की कमी के कारण लोग बांधों को रोजगार के विकल्प के रुप में देखते है। लोगो के लिये शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क व पुलों जैसी मूलभूत सुविधायें सरकार द्वारा ना देकर बांध कंपनियों द्वारा दिये जाने के वादे दिये जा रहे है। दूसरी तरफ बांध विस्थापितों को ये ही सुविधायें देने से बांध कंपनी कतराती हंै। यह सरकारी योजनाकारों की विफलता और प्राकृतिक संसाधनोें को लोगो से छीनने और उनके दुरुपयोग का खुला उदाहरण है।

हन सबके सबूत हमारे पास मौजूद है। कुछ फोटो और यूट्यूब के लिंक हम साथ में दे रहे है। जिनसे ये सारी असलियत सामने आती है। इन्हे हमारे ब्लाॅग <matugnaga.blogspot.com>पर देखा जा सकता है। हमने इन समस्याओं को संबंधित मंत्रालयों को पत्र द्वारा सूचित किया है। सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्राईब्यूनल में याचिकायें दायर की है।

बड़ी जलविद्युत परियोजनायें ही रोजगार का एक मात्र साधन नहीं हैं। उत्तराखंड राज्य की परिस्थिति देखते हुये, लोगो का जीवन स्तर ऊंचा उठाने के लिये व रोजगार के स्थायी साधन बनाने, पलायन रोकने के लिये उत्तराखंड राज्य सरकार व केन्द्र सरकार को हमारे कुछ सुझाव है.....
  • शिक्षा का स्तर प्राथमिक स्तर से ही उच्चस्तरीय बनाया जाये। कालेज तक के छात्रों के लिये मुफ्त रहने व भोजन की व्यवस्था हो।
  • व्यवसायिक प्रशिक्षण संस्थानों का भी प्रसार हो।
  • कार्यरत जलविद्युत परियोजनाओ की सही निगरानी और नियम-कानूनो-वादों के उंलघन पर दंड की व्यवस्था हो।
  • बंद पड़ी छोटी जलविद्युत परियोजनाओ को चालू किया जाये और उनसे उत्पादित बिजली का उपयोग स्थानीय स्तर पर पहले हो।
  • स्थायी रोजगार के लिए स्थानीय घराटों को उच्चीकृत किया जाये जिनसे ग्रामीणों को स्थायी रोजगार/खेतांे को पानी/गांव को बिजली भी मिल सके।
  • छोटी परियोजनायें जिनको, स्थानीय लोगों की सहकारी समिति या पंचायतों को आबंटित किया जाय ।
  • सेवा क्षेत्र, सूचना तकनीक, शिक्षा-स्वास्थ्य, अनुसंधान केंद्र, बागवानी, फलखेती, औषधि उत्पादन जैसी स्थायी रोजगार की योजनायें बनायी जायें।

हमारी नयी सरकार से मांग है किः-
  1. बड़े बांधों की समस्याओं पर विचार करे।
  2. आज तक बने चुके और निर्माणाधीन बांधो पर श्वेत पत्र जारी करे।
  3. उपर लिखे सुझावों पर गंभीरता से विचार करे ताकि उत्तराखण्ड का स्थायी विकास संभव हो।


विमलभाई,       पूरण सिंह राणा,        राजेंद्र सिंह नेगी,          रामलाल

bandh katha-2

Bandh katha
गंगा का दूसरा कोई विकल्प नहीं है।
-भरत झुनझुनवाला
गंगा की मनोवैज्ञानिक शक्ति स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जब गंगा पर बनाए जा रहे बांधों को रोकने की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे तो सरकार उनकी मांग को पूरा न सही आंशिक रूप से मानने पर सहमत हुई, जिस पर उन्होंने अपना अनशन समाप्त किया, लेकिन बाद में इस पर कोई अमल न होते देख वह पुन: अनशन के लिए विवश हुए। एक बार फिर सरकार ने देर से उनके अनशन की सुधि ली और उनकी मांगों पर विचार का आश्वासन दिया। इसके फलस्वरूप उन्होंने अपना अनशन वापस ले लिया है। ऐसे में कुछ मूल प्रश्नों पर विचार करना आवश्यक हो गया है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? सरकार के सामने जनता को बिजली उपलब्ध कराने की समस्या है। इस लिहाज से गंगा पर बनाए जा रहे बांधों के निर्माण को रोकना उचित नहीं प्रतीत होता। मैदानी क्षेत्र में कृषि उत्पादन बढ़ाने और जनता का पेट भरने के लिए गंगा के पानी को नहरों में डालना जरूरी है। गंगा के किनारे बसे तमाम शहरों के गंदे पानी का ट्रीटमेंट करने में हजारों करोड़ रुपये लगेंगे, जिसके लिए अतिरिक्त टैक्स लगाना होगा। दोनों ही पक्ष जनहित के नाम पर अपना-अपना तर्क दे रहे हैं इसलिए दोनों के जनहित के अंतर को समझना होगा। मनोविझान में मनुष्य की चेतना के दो प्रमुख स्तर हैं-चेतन व अचेतन। सामान्य भाषा में चेतन को बुद्धि तथा अचेतन को मन बताया जाता है। सुखी व्यक्ति की बुद्धि तथा मन में सामंजस्य होता है। सुख का सीधा फॉर्मूला है कि बुद्धि को मन के अनुरूप दिशा दी जाए, लेकिन मन को पहचानना काफी कठिन काम है। बुद्धि और मन का यह विभाजन ही तमाम रोगों और सांसारिक समस्याओं की जड़ भी है। जैसे युवा का मन टैक्सी ड्राइवर बनने का है, परंतु दोस्तों की बात मानकर वह दुकान में बैठ जाए तो वह व्यापार में घाटा खाता है। इसका कारण यही है कि दुकान में बैठा उसका मन वास्तव में वहां नहीं होता। उसकी कुल मानसिक शक्ति का आधा चेतन हिस्सा ही क्रियाशील रहता है। मन को जगाने का कठिन कार्य गंगाजी करती हैं, ऐसा माना जाता है। करोड़ों लोग अपने जीवन भर की कमाई को गंगा में एक डुबकी लगाने के लिए खर्च कर देते हैं। देव प्रयाग, ऋषिकेश और हरिद्वार में गंगा स्नान के लिए हर वर्ष आने वाले तीर्थयात्रियों के सर्वेक्षण में 77 प्रतिशत यात्रियों ने बताया या कि गंगा स्नान करने से उन्हें मानसिक शांति मिलती है। इसका कारण यही है कि स्नान से मन जागृत हो जाता है और बुद्धि मन के अनुसार दिशा पकड़ लेती है। इस बारे में पूछे जाने पर 26 प्रतिशत तीर्थयात्रियों ने बताया कि उन्हें केवल स्वास्थ्य लाभ हुआ। इसका भी कारण यही है कि मन की ऊर्जा जागृत होने से फेफड़े, हृदय आदि अंग सही-सही काम करने लगते, जिससे व्यक्ति का शरीर खुश होता है। 14 प्रतिशत ने बताया कि उन्हें व्यापार में और 12 प्रतिशत ने बताया कि उन्हें नौकरी में लाभ हुआ। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि मन की ऊर्जा जाग्रत होने पर इनके मन ने सही दिशा पकड़ी, जिससे अच्छे परिणाम मिले। गंगा की मन को जागृत करने की यह अदृश्य शक्ति बद्रीनाथ एवं केदारनाथ के पवित्र तीर्थ स्थलों से होकर बहने, पहाड़ी बहाव में गंगाजल में तांबा, क्रोमियम तथा थोरियम आदि के घुलने और कालीफाज नामक विशेष लाभकारी बैक्टीरिया के कारण आती है। जापान के वैज्ञानिक मसारू इमोटो ने अपने अध्ययन में पाया कि बहती नदी में पानी के अणु षट्कोणीय आकर्षक झुंड बना लेते हैं। संभवत: इन्हीं आणविक झुंडों के कारण गंगा के जल में मन को प्रभावित करने की शक्ति आती है। इमोटो ने पाया कि बहते पानी को बांध में रोक देने से इन झुंडों का सौंदर्य नष्ट हो जाता है। जलविद्युत टर्बाइन के पंखों से टकराने के बाद जल के षट्कोणीय झुंड बिखर जाएंगे और इससे वह लाभ नहीं मिलेगा जो गंगा के अबाध बहाव से मिलता है। उत्तरकाशी स्थित संस्था द्वारा टिहरी बांध के ऊपर एवं नीचे के पानी के नमूनों का स्विट्जरलैंड स्थित संस्था में परीक्षण कराया गया, जिसमें पाया गया कि टिहरी के ऊपर षट्कोणीय झुंडों में ऊर्जा के केंद्र दिखते हैं, जो बांध के नीचे बहाव वाले पानी में लुप्त हो जाते हैं। गंगा के बहाव को सुरंग तथा झील में बहाने से पत्थरों का घर्षण समाप्त हो जाएगा और तांबा आदि जल में नहीं घुलेंगे। पानी को टर्बाइन में डालने के पहले सभी वनस्पतियां निकाल दी जाती हैं। इससे लाभकारी बैक्टीरिया को भोजन नहीं मिल पाता और वे कालकवलित हो जाते हैं। मूल प्रश्न है कि गंगा की मनोवैज्ञानिक शक्तियों से अधिक जनहित हासिल होगा या बिजली से? बिजली के अन्य विकल्प भी हैं, जैसे कोयला एवं सौर ऊर्जा। सिंचाई के भी अन्य विकल्प हैं, जैसे गेहूं के स्थान पर जौ और चने की खेती करना, परंतु गंगा का दूसरा कोई विकल्प नहीं है। इसलिए ज्ञान स्वरूप सानंद की मांग जायज है और गंगा पर बन रहे सभी बांधों को रोकने के साथ-साथ पूर्व में बने टिहरी बांध को भी हटाने की पहल होनी चाहिए। इन बातों को न समझने के कारण ही भारत की जनता बांधों का समर्थन कर रही है। सरकार और जल विद्युत कंपनियां अपने लाभों के लिए गंगा को नष्ट करने पर आमादा हैं। कहा जा रहा है कि आमरण अनशन लोकतांत्रिक राजनीति के विपरीत है, लेकिन जब सरकार पर जलविद्युत कंपनियों का वर्चस्व हो तो गंाधीजी के इस अस्त्र का उपयोग करना सही प्रतीत होता है। यह सही है कि अनशन से बुद्धि को कुछ समझ नहीं आता है, परंतु अनशन से जनता केमन का भाव बदलता है, जो कि संवाद का एक तरीका है। यहां यह कहना सही नहीं होगा कि ज्ञानस्वरूप सानंद किसी तरह की राजनीति कर रहे हैं। श्री अरविंद तथा विवेकानंद जैसे मनीषियों की मानें तो विश्व में भारत की भूमिका आध्यात्मिक है और इस भूमिका का निर्वाह हम गंगा की मानसिक शक्ति का Oास करके नहीं कर सकेंगे। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

दैनिक जागरण  २५ मार्च २०१२ से साभार

हमारी नदी प्रणालियों के विनाश का नया अध्याय 1980 के दशक में नई उदार आर्थिक नीतियों के अपनाने के साथ शुरू हुआ। 

परिचय


हमारी नदी प्रणालियों के विनाश का नया अध्याय 1980 के दशक में नई उदार आर्थिक नीतियों के अपनाने के साथ शुरू हुआ। सच्चाई को छुपाने के लिये 1986 में गंगा एक्शन प्लान –1 शुरू किया गया था। विदेशी कंपनियों की कमाई तो हुई पर गंगा स्वच्छता अभियान पूरी तरह विफल हो गया और जानकार मानते हैं कि गंगा नदी की दुर्दशा पहले से ज्यादा बदतर हो गई। शासन असली मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाने में जरूर कामयाब रहा और स्वछता अभियान की आड़ में नदी प्रणाली को एक-एक करके नष्ट कर दिया गया था। इस पृष्ठ भूमि में हमें राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की आड़ में असली खेल को समझना होगा
भारत में अनादिकाल से ही गंगा जीवनदायिनी और मोक्ष दायिनी रही है, भारतीय संस्कृति, सभ्यता और अस्मिता की प्रतिक रही हैं। गंगा जी की अविरल और निर्मल सतत् धारा के बिना भारतीय संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती। गंगा जी को सम्पूर्णता में देखने और समझने की आवश्यकता है। गंगा केवल धरती की सतह पर ही नहीं है, ये सतत् तौर पर हमारे भीतर भी प्रवाहमान हैं, यह भूमिगत जल धाराओं, बादलों और शायद आकाशगंगा में भी सतत् प्रवाहमान है। समुद्र तटीय क्षेत्रों के आसपास ताजे पानी की धाराओं के गठन और नदी का सागर में मिलन, फिर वाष्पीकरण द्वारा बादलों का निर्माण और भारतीय भूखंड में मानसून ये सब घटनायें एक दूसरे से अभिन्न तौर पर जुड़ी हैं। इन सब प्रक्रियाओं को समग्रता से समझाना होगा। मनुष्य के हस्तक्षेप ने जाने–अनजाने, लोभ –लिप्सा के वशीभूत एक से अधिक तरीकों से इस पुरे चक्र को नष्ट और बाधित किया है।

इस बात को ईमानदारी से स्वीकारने और समझने की जरूरत है। संभवतः ईश्वर ने मनुष्य को शायद प्रकृति का एक ट्रस्टी नियुक्त किया है ताकि प्रकृति का संरक्षण और संवर्धन हो। यदि हम मुड़कर अपने हाल के इतिहास को देखें तों दुर्भाग्य से हम पाते हैं कि हम विपरीत दिशा में, विध्वंस और विनाश की दिशा में जा रहें हैं। इन सब बातों को दृष्टीगत रखते हुए ही हम गंगा के मुद्दों को समझने की कोशिश करनी होगी। गंगा नदी की गंगोत्री से गंगासागर तक की यात्रा लगभग 2615 किलोमीटर की है। गंगा जी की वर्तमान स्थिति को उचित तौर पर समझने के लिये तीन चरणों में विभाजित करके अध्ययन करना उपयोगी रहेगा:-

(I) गंगोत्री से बिजनौर बैराज तक
(Ii) बिजनौर से वाराणसी तक
(Iii) वाराणसी से गंगासागर तक


पहले चरण में कमोबेश अभी भी जल की शुद्धता बनी हुई है। परन्तु उतराखंड में गंगा की पंच शीर्ष धाराओं पर प्रस्तावित बांध और अन्य प्रकल्प गंगा नदी प्रणाली की प्रकृति और पर्यावरण को पूरी तरह नष्ट कर देंगे। गंगा यात्रा के दूसरे चरण में गंगा जी पर अत्यधिक दबाव है। घरेलू सीवेज, औद्योगिक और कृषि प्रदूषण से गंगा त्रस्त है। इसी चरण में प्रसिद्ध तीर्थ गढ़मुक्तेश्वर, प्रयागराज और काशी भी आते हैं। यात्रा का तीसरा चरण है वाराणसी से गंगासागर तक जो बारम्बार बाढ़ की विभीषिका और विनाश झेलता है। प्रकृति और वनों के विनाश ने बाढ़ की बारंबारता और विभीषिका को बढ़ाया है। इतिहास में नदियों की धाराओं ने अनगिनत बार अपनी दिशाओं और मार्ग को बदला है जो अध्ययन के लिए रोचक और आकर्षक विषय हो सकता है। परन्तु हाल के दिनों में मनुष्य द्वारा नदी और प्रकृति और पर्यावरण के साथ बेलगाम छेड़-छाड़ और हस्तक्षेप से गंगा नदी के अस्तित्व पर ही संकट आ गया है। हमें इस पूरी प्रक्रिया को गहराई से समझने की जरूरत है, जो इस आसन्न त्रासदी के कारण है।

आधुनिक भारत के इतिहास में गंगा


आधुनिक भारत में गंगा नदी पर आघात की प्रक्रिया की शुरुआत 18वीं सदी में अंग्रेजों के आगमन के साथ शुरू हुई थी। जब 1842 में, ब्रिटिश इंजीनियर प्रोब कोले द्वारा जाहिर तौर पर क्षेत्र में अकाल को रोकने के लिये ऊपरी गंगा नहर का निर्माण किया गया था और लगभग उसी समय अंग्रेजों ने हिमालय के वनों के विनाश की प्रक्रिया शुरू किया और व्यापारिक उद्देश्य से देवदार के वृक्षों का रोपण शुरू किया था जो हिमालय की पारिस्थितिकी के लिए अपूर्णीय क्षति का कारण बने, जिसका दुष्प्रभाव जल धाराओं और गंगा जी के प्रवाह पर हुआ है। इसी ब्रिटिश शासन के दौर में भी, विद्वानों का एक समूह गंगा का उपयोग, परिवहन और व्यापार के प्रमुख मार्ग के तौर पर करने के पक्ष में था। परन्तु रेलवे बिछाने की वकालत करने वाली लॉबी ने इस विचार पर हावी हो इसे पछाड़ दिया। देश में रेलवे के फैलते जाल ने भी जल धाराओं को प्रभावित किया। गंगा नदी के विनाश की और यह भी एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा है। पटना में जहां कभी पानी के बड़े जहाज चलते थे वहाँ आज मीलो बालू का विस्तार है और टखने तक गहरा पानी है।

1916 में जब हरिद्वार के चारों ओर नहरें बनाकर जलधारा का मार्ग बदला जा रहा था। तब हरिद्वार और गंगा जी की रक्षा के लिये महामना मदनमोहन मालवीय जी के नेतृत्व में प्रचंड संघर्ष हुआ। साम्राज्यवादी ब्रिटिश सरकार झुकी और उन्होंने मालवीय जी से वादा किया कि आगे से गंगा के प्रवाह और जल धारा के साथ कोई छेड़-छाड़ और कोई नुकसान नहीं किया जाएगा। परन्तु अफसोस कि स्वतंत्र भारत की सरकार ने उस वायदे का सम्मान नहीं रखा। इसके विपरीत गंगा सहित इसकी सहायक नदी प्रणालियों के साथ अकल्पनीय छेड़-छाड़ की जो हमारी नदियों के विनाश का कारण बन रही है। विनाश के कुछ प्रमुख कृत्यों की झलक निम्नलिखित हैं:

1. बिहार नेपाल कि सीमा पर 1960 में कोसी बैराज का निर्माण और बिहार की प्रमुख नदियों को तटबांधो में बांधने के प्रयास जिसके कारण उत्तर बिहार में बाढ़ से अपार क्षति हुई है। 1971 में राजमहल में फरक्का बैराज का निर्माण।
2. ऊपरी गंगा नहर प्रणाली के माध्यम से और अधिक मात्रा में पानी को नदी से निकालना।
3. गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी यमुना पर पश्चिमी यमुना नहर पर हथिनी कुंड में एक नए बांध का निर्माण यमुना जल को नदी की धारा में जाने से रोक लिया गया।
4. उत्तराखंड में विशालकाय टिहरी बांध का निर्माण और पंच गंगाओं पर बांध निर्माण और अन्य प्रकल्प जो जल धाराओं के अविरल प्रवाह में रुकावट होंगे।
5. गंगा के मध्य भाग में गंगा के सभी प्रमुख सहायक नदियों- यमुना, काली, रामगंगा आदि को गंदे और प्रदूषित नालों में तब्दील कर दिया गया है।
6. हम युवा पीढ़ी को गंगा नदी प्रणाली की मुलभूत बातों और महत्व से अवगत कराने में विफल रहें।
7. हमने विदेशी विशेषज्ञों की सलाह पर ऐसी कृषि पद्धतियों को अपनाया, अपने रहन-सहन और खान-पान में बदलाव किया जो हमारी जलवायु के अनुकूल नहीं है। जिससे कृषि, जल और स्वास्थ्य क्षेत्र में पूरी गंगा बेसिन क्षेत्र में संकट पैदा हो गया है।

हमारी नदी प्रणालियों के विनाश का नया अध्याय 1980 के दशक में नई उदार आर्थिक नीतियों के अपनाने के साथ शुरू हुआ। सच्चाई को छुपाने के लिये 1986 में गंगा एक्शन प्लान –1 शुरू किया गया था। विदेशी कंपनियों की कमाई तो हुई पर गंगा स्वच्छता अभियान पूरी तरह विफल हो गया और जानकार मानते हैं कि गंगा नदी की दुर्दशा पहले से ज्यादा बदतर हो गई। शासन असली मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाने में जरूर कामयाब रहा और स्वछता अभियान की आड़ में नदी प्रणाली को एक-एक करके नष्ट कर दिया गया था। इस पृष्ठ भूमि में हमें राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की आड़ में असली खेल को समझना होगा, विश्व बैंक का इस परियोजना को समर्थन करने और बड़ी मात्रा में पूंजी निवेश करने के पीछे असली मंशा क्या है और भारत सरकार द्वारा इसे स्वीकार करने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?

गंगा नदी प्रणाली को हुई मुख्य क्षतियां


1. वनों का विनाश और उसका नदी की धाराओं और स्थानीय जलवायु पर दुष्प्रभाव।
2. गंगा नदी की गंगा सागर तक की पूरी यात्रा में बड़े बांधों और बैराजों का निर्माण कर प्रवाह में अवरोध।
3. नदी के पानी को नहर प्रणाली द्वारा खींच लिया जाना।
4. भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन।
5. तालाबों आदि अन्य जल क्षेत्रों का विनाश।
6. नदी भूमि, खादर और कछार क्षेत्रों पर अतिक्रमण

समाज


भारतीय समाज औपनिवेशिक चेतना और नव औपनिवेशिक चेतना के द्वन्द में फंस गया है।

शासन प्रक्रिया


पापों को धोने वाली गंगा अब मैली हो गई हैपापों को धोने वाली गंगा अब मैली हो गई हैराष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के तहत गंगा नदी प्रणाली की बहाली (अविरल और निर्मल धारा बनाना) के वर्तमान प्रयासों में अनेक तकनीकी और प्रशासनिक खामियां हैं। उदहारण के लिये :-

1. गंगा नदी प्रणाली पर काम कर रही एजेंसियों ने विनाश के कारणों का गहन आकलन कर कोई सूची तैयार नहीं की गई है।
2. गंगा एक्शन प्लान -1 और गंगा एक्शन प्लान-2 में हुई गलतियों के बारे में मात्र जबानी जमा खर्च किया जा रहा है। वास्तव में गलतियाँ कहाँ और क्यों हुई इसकी कोई गंभीर और गहन समीक्षा नहीं की गई। इसका मतलब है वही गलतियां फिर बड़े पैमाने पर दोहराई जाने की सम्भावना है। गलतियों के लिये किसी की जिम्मेवारी तय नहीं की गई। सलाहकारों और विशेषज्ञों द्वारा ली गई महंगी सलाह भी क्यों विफल रही इसका कोई आकलन नहीं हुआ है।
3. राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण को तकनीकी सलाह देने के लिये बने आईआईटी कंसोर्टियम का नेतृत्व एक “ई टी आई डायनमिक्स” नामक अंतर्राष्ट्रीय निगम द्वारा किया जाना भी जाँच-परख की विषय वस्तु है।
4. शून्य निर्वहन नीति की बात की जा रही है यह अवधारणा भी एक भ्रम है और इसे चुनौती दी जानी चाहिए। प्रदूषण मुक्ति के जैविक और विकेन्द्रित उपायों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। इन उपायों को सिरे से नकारे जाने की प्रवृती संदेह उत्पन्न करती है।
5. वर्तमान में NGRBA के अधिदेष में “निर्मल और अविरल धारा का मुद्दा शामिल नहीं है, यह केवल गंगा नदी प्रबंधन और प्रदूषण मुक्त करने की बात करता है।
6. राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का सभी संवाद अंग्रेजी में किया जा रहा है, जो गंगा बेसिन के लोगों की पहली भाषा नहीं है। जरूरी है की गंगा बेसिन के निवासियों जो इस योजना से प्रभावित होने वाले हैं से उनकी भाषा में संवाद किया जाये। अन्यथा पूरी संवाद प्रक्रिया में वे हाशिए पर ही रहेंगे।
7. प्रदूषण नियंत्रण की जिम्मेदारी शहरी स्थानीय निकायों के पास है परन्तु 73वें संविधान संशोधन के बावजूद वास्तविक शक्तियां उनके पास नहीं है।

नदी प्रणालियों में हस्तक्षेप का औचित्य मानवीय हित में किया जाना बताया जाता है– जैसे की सिंचित भूमि बढ़ाना, बाढ़ पर नियंत्रण, सूखे और गर्मी के समय के लिये जल संचयन, पन-बिजली बनाने के लिए और अतिरिक्त जल निस्तारण के लिये निकास नाली के रूप में उपयोग इत्यादि– इन सभी मुद्दों पर बहस हो सकती है। आधुनिक मानव इन अवधारणाओं को स्वीकार करता जान पड़ता है और परिणामतः इसके विनाशकारी प्रभावों का सामना करना पड़ता है लेकिन इस आत्मघाती रास्ते से परहेज करने के लिए ये पर्याप्त कारण नहीं हैं।

रास्ता क्या है


जैसा की शुरुआत में ही कहा गया है कि केवल गंगा नदी की धारा वहीं नहीं है, जो धरती की सतह पर दिखती है। गंगा अभियान में लगे कार्यकर्ताओं को तों इस बात को अधिक गहराई से महसूस करने की जरूरत है। यदि हम ईमानदारी से पवित्र गंगा जी की रक्षा करना चाहते हैं, तो जरूरी है कि हम अपने विकास प्रतिमानों में बदलाव लाएं, सामाजिक परिवर्तन और शासन व्यवस्था में परिवर्तन जरूरत को समझे। यदि भारतीय अद्वैत दर्शन को मानें तो गंगा की पवित्रता, निर्मलता और सुंदरता हमारा स्वयं का प्रतिबिंब ही है। कुछ समर्पित गंगा भक्तों द्वारा गंगा को अविरल और निर्मल बनाने का अभियान चलाया जा रहा है। हरिद्वार में स्वामी निगमानंद का बलिदान सर्वविदित है। जिन्होंने उतराखंड में गंगा नदी प्रणाली को तबाह करने वाले खनन माफिया के खिलाफ अभियान चलाया और शहीद हो गये। स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जी।(जीडी अग्रवाल) जी ने भी गंगा सेवा अभियान में गंगा मइया की रक्षा के लिये अपने प्राणों की बाजी लगा दी है। उन्होंने काशी में गंगा जी के तट पर निर्जल तपस्या जारी राखी है। इसके अतिरिक्त भी देश भर में मशहूर हस्तियों के नेतृत्व और संस्थाओं ने प्राण-पन से गंगा रक्षा का अभियान चलाया हुआ है। हम इन सभी का विनम्र अभिवादन और समर्थन व्यक्त करते हैं। हम सभी के साथ निम्नलिखित मुद्दों पर आगे चर्चा के लिए कार्रवाई का मसौदा कार्यक्रम यहाँ रख रहे है :-

1. गंगा के मुद्दों के बारे में लोगों को शिक्षित करना क्या हम जोरदार ढंग से कह सकते हैं कि देश भर में ऐसे 1000 कार्यकर्ताओं/ शिक्षाविदों/राजनेताओं नौकरशाह का समूह है जिसे आज गंगा नदी के बारे में जुड़े मुद्दों की पूरी रेंज के बारे में पता है?
2. हमारे पारम्परिक ज्ञान, हमारी आस्थाओं और सांस्कृतिक प्रथाओं का अध्ययन और प्रचार प्रसार परंपरागत ज्ञान, विश्वास, पानी, जल स्रोत, नदियों के प्रति श्रद्धामय रवैया और दूसरी आधुनिक जीवन शैली में झूलते जीवन के बारे में विचार–विमर्श को आमंत्रित करना।
3. गंगा नदी प्रणाली और देश में अन्य नदियों को हुई बड़ी क्षति का अध्ययन कर जानकारी का प्रसार करना। कैसे अस्सी के दशक में देश में शुरू हुई नवउदारवादी विकास के एजेंडे के आगमन के बाद से हमारी नदियों और पर्यावरण का विनाश तेजी से बढ़ा है।
4. NGRBA के तहत प्रस्तावित तकनीकी और प्रशासकीय समाधान के मुद्दों पर गहराई से विचार विमर्श और बहस को आमंत्रित करना।
5. छोटी नदी प्रणाली कि पुनर्बहाली कि सफलता की कहानियों,भू-जल की रिचार्जिंग,जल संरक्षण और प्रबंधन की पारंपरिक प्रणालियों जैसे बिहार की आहार पाईन प्रणालियों का अध्ययन कर प्रलेखित किया जाना चाहिए ताकि उन्हें अन्य जगह अपनाया और दोहराया, जा सके और कोई बहाना बनाकर इनकी अनदेखी ना की जा सके।
6. हमें अपनी औपनिवेशिक चेतना से बाहर आकर सोचने की जरूरत है और इसी के साथ-साथ नव उदारवाद के मोहपाश के समाधान को देख समझ कर फंदे से बाहर निकलना होगा। ऐसा करने के लिए पूर्व शर्त है की हम प्रकृति और नदियों की ओर एक श्रद्धामय रवैया अपनाकर नया रास्ता तलाश करें।
7. बाल्मीकि समुदाय को भी इस महान यज्ञ में एक न्याय पूर्ण स्थान और गंगा नदी के प्रदूषण की रोकथाम में बराबर की भागीदार होनी चाहिए।