Saturday, June 23, 2012

प्राकृतिक संसाधनों की लूट की परियोजनाएं:हमारी बेसहारा गंगा नदी


उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने लगता है अपने एजेंडे पर काम करना शुरू कर दिया है। उनके साथ उन लोगों की एक बड़ी जमात जुट गई है जो सत्ता के आसपास रहकर अपने हित साधने में लगी रहती है। मुख्यमंत्री ने आते ही राज्य में बन रही जलविद्युत परियोजनाओं का जिस तरह से पक्ष रखा है, उससे लगता है कि उन्होंने कारपोरेट, परियोजनाओं को बनाने वाली कंपनियों और स्थानीय ठेकेदारों का जबर्दस्त समर्थन किया है। द हिंदू में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार17 अप्रैल को दिल्ली में नेशनल गंगा रीवर बेसिन अथारिटी की बैठक में विजय बहुगुणा ने कहा पर्यावरण और वन मंत्रालय ने जिन जल परियोजनाओं को तकनीकी मंजूरी दे दी है उन्हें कुछ लोगों की ‘मात्र अनुभूत भावनाओं के कारण’ बंद नहीं किया जाना चाहिए। आश्चर्यजनक रूप से उनकी इस बात का जबर्दस्त विरोध हुआ। विरोध करनेवालों में राजेन्द्र सिंह सहित कई पर्यावरण विद शामिल थे।
इस घटना के पंद्रह दिन के अंदर ही राज्य में कई जगह बांधों के पक्ष में प्रदर्शन हुए। उसके बाद 4 मई को देहरादून में बुद्धिजीवियों का पद्मश्री लौटाने की धमकी का नाटक हुआ। यह खेल किस तरह से खेला जाएगा इसका अनुमान लोगों को पहले से ही था। जब विजय बहुगुणा ने मुख्यमंत्री का पद संभाला था तो उनके विरोधियों को शंका थी कि उन्हें प्रदेश का मुखिया बनाने में इन्हीं लोगों का हाथ है। राष्ट्रीय स्तर पर गंगा को लेकर चलनेवाले सरोकारों को काटने के लिए इस बात की सच्चाई तो तभी सामने आयेगी जब कभी इस की कोई निष्पक्ष जांच होगी। लेकिन कुछ बातें जो नजर आ रही हैं वे इस नापाक गठबंधन की ओर तो इशारा करती ही हैं, इस राज्य के भविष्य के लिए भी कोई शुभ संकेत नहीं मानी जा सकतीं। हैरानी की बात यह है कि मुख्यमंत्री ने अपनी कुर्सी को सुरक्षित करने के लिए आधारभूत कदम विधान सभा का सदस्य बनने से पहले ही ऐसे विवादास्पद मुद्दे को आगे बढ़ाना क्यों शुरू किया है जिसको लेकर राज्य में पहले से ही व्यापक विवाद और असंतोष है। इधर भाजपा के तराई के सितारगंज क्षेत्र के विधायक किरण मंडल को तोड़ लिया गया है। जिन अफरातफरी भरी संदेहास्पद स्थितियों में मंडल से इस्तीफा दिलवाया गया है वह बतलाता है कि बहुगुणा वहीं से चुनाव लडऩे जा रहे हैं। अब देखने की बात होगी कि इस चुनाव में कितने धनबल और बाहुबल का इस्तेमाल होता है।
इस बांध बनाओ मुहिम में मुख्यमंत्री के साथ बांध निर्माण कंपनियां, बड़े कारपोरेट घराने, स्थानीय ठेकेदार और राजनीतिक पार्टियों के नुमाइंदे तो हैं ही अब पहाड़ के बुद्धिजीवियों का एक वर्ग भी खासी धूम-धाम से शामिल हो गया है। सरकारी पुरस्कारों से सम्मानित, कभी सरकार में लालबत्ती पाने वाले, मुख्यमंत्रियों के मीडिया सलाहकार बनने की कतार में खड़े रहने वाले इन लोगों ने अब जलविद्युत परियोजनाओं को उत्तराखंड की आर्थिकी का आधार बताना शुरू कर दिया है। चारों तरफ से खतरे में घिरी पहाड़ की जनता जब हिमालय और अपनी प्राकृतिक धरोहरों को बचाने के आंदोलन को आगे बढ़ा रही है तब इन बुद्धिजीवियों को लगता है कि बांध बनेंगे, बिजली उत्पादित होगी तो यहां से पलायन रुकेगा। उन्होंने बांध विरोधी जनता को सीआईए के एजेंट से लेकर विकास विरोधी तमगों से नवाजा है। पिछले दिनों देहरादून में इन बुद्धिजीवियों ने घोषणा की कि यदि जलविद्युत परियोजनाओं पर काम शुरू नहीं हुआ तो वे अपने पद्मश्री पुरस्कार वापस कर देंगे। इनमें एक साहित्यकार लीलाधर जगूड़ी, एनजीओ चलाने वाले कोई अवधेश कौशल और गढ़वाल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति ए एन पुरोहित शामिल हैं, जिन्हें पहाड़ के लोगों ने तब जाना जब इन्हें पद्मश्री पुरस्कार प्राप्त हुये। इस समूह गान में सबसे ज्यादा ऊंची आवाज में गानेवाले एक पत्रकार महोदय हैं जो फिर से अपना भाग्य आजमाने में लगे हैं। वह हर मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार बनने के लिए लाइन में खड़े रहते हैं पर अब तक उन्हें उनके बड़बोलेपन के कारण किसी ने उपकृत नहीं किया। हो सकता है बेचारे की किस्मत इस बार जाग जाए!
padmsree-return-drama-in-dehradunयह बात किसी से छिपी नहीं है कि इस पहाड़ी राज्य में जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण और इसे बिजली प्रदेश बनाने का सपना यहां की जनता की बेहतरी के लिए नहीं है। इस पूरी परिकल्पना के पीछे विकास के नाम पर एक बेहद शातिराना मुहिम चल रही है। सत्तर के दशक में टिहरी बांध के बाद विकास का यह दैत्याकार मॉडल लगातार यहां के लोगों को लील रहा है। प्राकृतिक धरोहरों के बीच रहने वाली जनता को लगातार उससे दूर करने की साजिश और इसे बड़े इजारेदारों को सौंपने की सरकारी नीतियां हिमालय के लिए बड़ा खतरा हैं। इस साजिश में अब नये नाम जुड़ते जा रहे हैं। पिछले दिनों जलविद्युत परियोजनाओं पर जिस तरह से बुद्धिजीवियों, मीडिया घरानों, सामाजिक संगठनों के एक बड़े हिस्से ने अपनी पक्षधरता दिखाई है वह चकित करनेवाली है। अब तक ऐसा नहीं था कि मीडिया और बुद्धिजीवी इस तरह से खुल कर बांधों के पक्ष में काम कर रहे हों। इससे स्पष्ट लगता है कि इस में इन तमाम वर्गों का एक ऐसा गिरोह काम करने लगा है जो इस नव गठित राज्य में चल रही लूट में शामिल हो जाने को लालायित हैं और जिन्होंने भ्रष्ट नेताओं और पूंजीपतियों से अपने स्वार्थ के चलते घनिष्ठ संबंध बना लिए हैं।
विजय बहुगुणा ने जिस तत्परता से जलविद्युत परियोजनाओं की वकालत शुरू की है तथा उसके बिना विकास को बेमानी कहा है, उससे कई तरह की शंकाओं का पैदा होना लाजमी है। बांधों के पक्ष में प्रायोजित प्रदर्शन किए जाने लगे हैं। इस बात को समझा जाना चाहिए कि आखिर अचानक इन सब लोगों का जलविद्युत परियोजनाओं से मोह क्यों जाग गया। यह सवाल तब और महत्त्वपूर्ण हो जाता है जब राज्य के विभिन्न हिस्सों में बांधों के खिलाफ लगातार जनआंदोलन चल रहे हैं। पिछले दिनों पिंडर पर बांध न बनाने को लेकर जबर्दस्त आंदोलन हुआ है और केदार घाटी में जनता ने नारा दिया है सर दे देंगे, लेकिन ‘सेरा’ (बड़े सिंचित खेत) नहीं देंगे। प्रशासन लगातार आंदोलनकारियों को जेल में डालता रहा है। कई स्थानों पर अभी भी लोग जनसुनवाइयों में बांधों का जमकर विरोध कर रहे हैं। जो मीडिया गौरादेवी के चिपको आंदोलन को बढ़-चढ़ कर छापता रहा है उसे अब गौरा के रैंणी गांव के नीचे की सुरंग नहीं दिखाई दे रही है। जो लोग जनपक्षीय कवितायें लिख रहे थे वे अब बांधों के लिए गीत लिख रहे हैं पर मुख्यमंत्री के सानिध्य में। पत्रकारों को कंस्ट्रक्शन कंपनियां गंगा घाटी की सैर करा रही हैं। कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकायें इतनी बेशर्मी पर उतर आयी हैं कि उन्हें चमोली जनपद में अलकनंदा पर बन रहे बाधों से प्रभावित लोगों की चीत्कार सुनाई नहीं दे रही है। प्रदेश के दैनिक तो सत्ताधारी दल के सुर में सुर मिला ही रहे थे राष्ट्रीय अखबारों ने भी अपना योगदान शुरू कर दिया है। सबसे पहले दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले साप्ताहिक शुक्रवार में पद्मश्री बुद्धिजीवियों के बयानों को लेकर रिपोर्ट छपी है। अगला नंबर इंडिया ट़ुडे हिंदी का आया जिसने 24 मई के अंक में बांधों के पक्ष में अविश्वसनीय संदर्भों पर आधारित रिपोर्ट छापी।
जलविद्युत परियोजनाओं को जिस शातिराना तरीके से मीडिया मात्र आस्था और पर्यावरण का सवाल बना रहा है वह उत्तराखंड की जनता के खिलाफ षडय़ंत्र से कम नहीं है। असल में गंगा को सिर्फ आचमन या शुद्धता के लिए बचाने की बात कहकर बांधों के खिलाफ अभियान को कमजोर किया जा रहा है। मीडिया के शीर्षक अपने आप में एक कहानी हैं। इंडिया टुडे ने ‘आस्था पर भारी विकास’ से यही कहने की कोशिश की है। शुक्रवार साप्ताहिक का शीर्षक था ‘अब बुद्धिजीवी संत समाज से टकराएंगे’ असलियत यह है कि गंगा को बचाने के लिए गंगा के पास रहने वाले लोगों का बचना जरूरी है। यह मसला संत समाज और बांध निर्माण की पक्षधर सरकार के बीच का नहीं है। न ही गंगा को शुद्ध रखने का आंदोलन जनता का आंदोलन है। जनता का आंदोलन अपने खेत-खलिहानों को बचाने का है। दूसरा सवाल पर्यावरण का है। उत्तराखंड में इस समय पचास हजार से ज्यादा एनजीओ काम कर रहे हैं। ये सभी हिमालय और गंगा की चिंता में दुबले हो रहे हैं। इन्होंने गंगा, हिमालय और पर्यावरण का ठेका ले लिया है। इनके पूरे अभियान में कहीं जनता के हित नहीं हैं।
गंगा फिर से चर्चा में है। कभी सरकारी महकमे में बांधों को पर्यावरणीय संस्तुति देने वाले वैज्ञानिक अब साधु बन गए हैं। साधुओं का गुजारा बिना गंगा के नहीं होता है। कई पर्यावरणविद् और एनजीओ हैं जिनकी रोटी-रोजी इसी से है। सरकार राष्ट्रीय स्तर पर गंगा बेसिन प्राधिकरण में अपनी चिंता साझा करती है। इन सबके बीच मध्य हिमालय में बांधों का बनना जारी है। लोग अपनी जमीन-खेत बचाने के लिए सड़कों पर हैं। उत्तराखंड सरकार इस बात पर दुखी हो रही है कि जितनी विद्युत उत्पादन क्षमता उत्तराखंड की नदियों की है, उसे दोहन क्यों नहीं किया जा रहा है तो इससे पहले भाजपा सरकार ने गंगा को बाजार बनाकर बेचा है।
विकास के नाम पर लोगों को बरगलाने का सिलसिला बहुत पुराना है। टिहरी बांध के विरोध में स्थानीय लोगों ने लंबी लड़ाई लड़ी। आखिर सरकार की जिद और विकास के छलावे ने एक संस्कृति और समाज को डुबो दिया। राज्य में प्रस्तावित सैकड़ों जलविद्युत परियोजनाओं से पूरा पहाड़ खतरे में है। इनसे निकलने वाली सैकड़ों किलोमीटर की सुरंगों से गांव के गांव खतरे में हैं। कई परियोजनाओं के खिलाफ लोग सड़कों पर हैं। बांध निर्माण कंपनियों का सरकार की शह पर मनमाना रवैया जारी है। जिन स्थानों पर जनसुनवाई होनी है, वहां जनता के खिलाफ बांध कंपनियों और स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से भय का वातावरण बनाया गया है। राज्य की तमाम नदियों पर बन रही सुरंग-आधारित परियोजनाओं से कई गांव मौत के साये में जी रहे हैं। सरकार ने चमोली जनपद के चाईं गांव और तपोवन-विष्णुगाड़ परियोजना की सुरंग से रिसने वाले पानी से भी सबक नहीं लिया। यहां सुरंग से भारी मात्रा में निकलने वाले पानी से पौराणिक शहर जोशीमठ के अस्तित्व को खतरा है।चमोली जनपद के छह गांव पहले ही जमींदोज हो चुके हैं। तीन दर्जन से अधिक गांव इन सुरंगों के कारण कभी भी धंस सकते हैं। बागेश्वर जनपद में कपकोट में सरयू पर बन रहे बांध की सुरंग से सुमगढ़ में मची भारी तबाही में 18 बच्चे मौत के मुंह में समा गए थे। भागीरथी पर बन रहे बांधों के खतरे सबके सामने हैं। टिहरी का जलस्तर बढऩे से कई गांव मौत के साये में जी रहे हैं। बावजूद इसके आंखें बंद कर राज्य को बिजली प्रदेश बनाने की जिद में बांध परियोजनाओं को जायज ठहराने की जो मुहिम चली है वह पहाड़ को बड़े विनाश की ओर ले जा सकती है। अब पूरे मामले को छोटे और बड़े बांधों के नाम पर उलझाया जा रहा है। असल में बांधों का सवाल बड़ा या छोटा नहीं है, बल्कि सबसे पहले इससे प्रभावित होने वाली जनता के हितों का है।
उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों से गंगा को अविरल बहने देने और आस्था के नाम पर प्रो. जी.डी. अग्रवाल अनशन पर हैं। सरकार ने उनकी जान बचाने की कीमत पर पहले लोहारी-नागपाला परियोजना को बंद किया अब अलकनंदा पर बन रही पीपलकोटी परियोजना पर रोक लगा दी है। इसमें दो राय नहीं कि इस तरह की सुरंग आधारित सभी परियोजनाओं को बंद किया जाना चाहिए, लेकिन इसमें जिस तरीके से गंगा को सिर्फ आस्था के नाम पर सिर्फ 135 किलोमीटर तक शुद्ध करने की बात है, वह अर्थहीन है। असल में धर्म और आस्था के नाम पर चलने वाली भाजपा और संतों से डरने वाली कांग्रेस के लिए जनता का कोई मूल्य नहीं है। गंगा मात्र आचमन करने के लिए नहीं है। जल विद्युत परियोजनाओं का मतलब है वहां के निवासियों को बेघर करना। आस्था का सवाल तो तब आता है जब वहां लोग बचेंगे। प्रो. जी.डी. अग्रवाल उर्फ स्वामी सानंद के हिंदू परिषद के एजेंट के रूप में काम करने का किसी भी हालत में समर्थन नहीं किया जा सकता। पिछले चालीस वर्षों से जलविद्युत परियोजनाओं का विरोध कर रही जनता की इन सरकारों ने नहीं सुनी। लंबे समय तक टिहरी बांध विरोधी संघर्ष की आवाज को अगर समय रहते सुन लिया गया होता तो आज पहाड़ों को छेदने वाली इन विनाशकारी जलविद्युत परियोजनाओं की बात आगे नहीं बढ़ी होती। लोहारी-नागपाला ही नहीं, पहाड़ में बन रही तमाम छोटी-बड़ी जलविद्युत परियोजनायें यहां के लोगों को नेस्तनाबूत करने वाली हैं।
इस बात का स्वागत किया जाना चाहिए कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने देश के विभिन्न हिस्सों में मुनाफाखोर विकास की प्रवृत्ति पर लगाम लगाने के कुछ अच्छे कदम उठाये। ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों में खान एवं जलविद्युत परियोजनाओं के खिलाफ व्यापक आंदोलन और जनगोलबंदी का परिणाम है कि अब ऐसी परियोजनाओं से पहले सरकारों को दस बार सोचना पड़ेगा। फिलहाल उत्तराखंड में बांध निर्माण कंपनियां और उनके एजेंट के रूप में काम कर रहे राजनीतिक लोगों ने जिस तरह बांधों के समर्थन का झंडा उठाया हुआ है, उसका भंडाफोड़ और उसे नाकाम करना जरूरी है।
साभार : चारू तिवारी, समयांतर 
http://samyantar.com

Friday, June 8, 2012

इस विचित्र देश के कुछ दुर्लभ सीन जिस देश में गंगा बहती है-I


हमारा देश एक विचित्र देश है. जितना विचित्र हमारा देश है. उससे कहीं अधिक विचित्र हमारे नेता लोग हैं. कोई ऐसा मुद्दा जिस में कुछ भी राजनीति करने की गुंजाइश हो उसको हमारे नेता लोग किस तरह लपकते हैं यह व्यंग उसका उदाहरण हैं. पेश है एक ऐसा ही मुद्दा - दिनांक १६ अगस्त - कलमाड़ी ने सुप्रीम कोर्ट में जमानत के लिए अपील की. उनका कहना है की वह उन्होंने जो भी पाप किये है उनको वह गंगा में नहाकर धोना चाहते हैं.  इसको लेकर अपने समर्थन में उन्होंने तमाम ग्रंथों और पुराणों का हवाला दिया. 

दिनांक १७ अगस्त - १२ बजे -  सुप्रीम कोर्ट ने धर्म कर्म में उनकी आस्था को देखते हुए उनकी जमानत ४ दिनों के लिए मंजूर की. (क्यूंकि कोर्ट पहले भी आस्था के आधार पर अपना फैसला एक और मुकदमे में दे चुकी है.)

१ बजे- प्रधानमंत्री ने गंगा की सफाई के लिए १००० करोड़ की अतिरिक्त राशि मंजूर की.

२ बजे -  येदीयुरप्पा ने भी कर्नाटक से लेकर हरिद्वार तक की यात्रा का ऐलान किया.

३ बजे -  कलमाड़ी ने समस्त भ्रष्ट कांग्रेसियों से अपने पाप धोने की अपील की. उन्होंने कहा कि वह दिल्ली से हरिद्वार तक पैदल यात्रा करेंगे. उन्होंने समस्त कांग्रेसी नेताओं और कार्यकर्ताओं से उनकी यात्रा से जुड़ने का आह्वान किया और कहा कि वह भी अपने पाप धो डालें. साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एक और अपील दायर की,  जिस में उन्हों ने कहा कि उनकी जमानत की अवधि ४ दिनों से बढाकर १ माह की जाय.

४ बजे - मंत्रिमंडल की आपात बैठक में गंगा की सफाई के लिए १० लाख करोड़ रुपये मंजूर.

५ बजे -  लालकृष्ण अडवाणी के घर बीजेपी की बैठक. अडवानी ने  बीजेपी कार्यकर्ताओं और नेताओं को भी गंगा में जाकर पाप धोने की अपील की. साथ ही
प्रधानमंत्री से अपील की गंगा की सफाई के लिए ५० लाख करोड़ रुपये मंजूर किये जाये,  अगर सरकार चाहे तो इसके लिए विश्व बैंक से लोन भी ले सकती है.

६ बजे -  बीजेपी के प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. उन्होंने ने सारी जिम्मेदारी आलाकमान पर डाल दी. 

७ बजे- देश भर में तहलका क्यूंकि अभी अभी खबर आई कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री निशंक ने गंगा में स्नान किया. 

८ बजे -  हर की पौड़ी में एनएसजी कमांडो तैनाम केन्द्र ने राज्य सरकार की आलोचना की. सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करार दिया. और कहा कि
अगर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना की गयी तो सरकार अनुच्छेद ३५६ के तहत सरकार को बर्खास्त कर सकती है. साथ ही सरकार ने राज्यपाल से भी इस मामले पर रिपोर्ट माँगी.

९ बजे - निशंक ने कहा कि केन्द्र सरकार राज्य सरकार से सौतेला बर्ताव कर रही है. उन्होंने इसके विरोध में एक बड़ी रैली करने की बात कही.

१० बजे -  देश भर में बवाल. कई और दलों ने भी अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं से गंगा नहाने की अपील की. एक दल ने तो कहा कि आजकल देश भर में  लोकपाल नामक बीमारी की बड़ी चर्चा है. अगर वह पास हो गया तो वैसे भी पाप करने का मौका नहीं मिलेगा इसलिए हम पुराने पाप धो डालें. ताकि सारे पाप धोकर नए सिरे से राजनीति कर सकें.

११ बजे -  सोनिया गाँधी के घर आपात बैठक. दिल्ली से लेकर हरिद्वार तक धारा १४४ लगाने की सुझाव.

१२ बजे -  मायावती और निशंक ने धारा १४४ लगाने से मना किया. निशंक ने जहाँ गंगा में नहाने को पुण्य का कार्य बताया वहीँ मायावती ने इसे मनुवादियों
की साजिश करार किया. और कहा कि यह उनकी सरकार को गिराने का षड्यंत्र है. साथ ही अपने कार्यकर्ताओं से कहा कि वह इस साजिश को नाकाम करने के लिए दिन रात एक कर दें.

१ बजे -  मीडिया ने कई दलों के कार्यकर्ताओं को गंगा में नहाते हुए अपने कैमरों में कैद किया. देश भर में बवाल. 

दिनांक १८ अगस्त -  प्रातः ४ बजे -  माँ गंगा ने घबराकर शिवजी से प्रार्थना की कि वह एक माह तक उन्हें अपनी जटाओं से मुक्त ना करें.

५ बजे- नारायण सामी ने इसे लोकतंत्र का अपमान बताया. उन्होंने इसके लिए माँ गंगा और शिवजी पर लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगाया. साथ ही धमकी भी
दी की इसके लिए उनके ऊपर संसद की अवमानना का केस भी दर्ज हो सकता है. 

६ बजे- अब्दुल्ला बुखारी ने इस सबको धर्मनिरपेक्षता के लिए खतरा बताया. उन्होंने अफज़ल गुरु और कसाब से कहा कि वह भी हज पर जाने के लिए जमानत
मांगें.  

७ बजे -  मुलायमसिंह,  लालूप्रसाद यादव और रामविलास पासवान ने एक सयुंक्त संवाददाता सम्मेलन में अब्दुल्ला बुखारी की मांग का समर्थन किया. 

८ बजे - दिग्विजय सिंह ने कहा कि कलमाड़ी गंगा से लेकर उस समुन्दर की यात्रा करें जहाँ ओसामाजी दफ़न हैं,  इससे कांग्रेस को हिंदू और मुसलमान दोनों के
वोट मिलेंगे. इसके लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से कलमाड़ी को १ साल तक जमानत देने का अनुरोध किया. और सरकार से भी कहा कि अगर ऐसा नहीं होता है
तो सरकार उन पर से मुकदमा वापस ले ले. 

९ बजे -  प्रधानमंत्री घबराकर १० जनपथ पहुंचे. सोनिया गाँधी और प्रधानमंत्री के बीच वार्ता.

१० बजे -  बीजेपी ने नारायण सामी की आलोचना की. उनके बयान को हिंदू धर्म का अपमान बताया. 

११ बजे -  प्रधानमंत्री ने कहा कि एक कमेटी कलमाड़ी की यात्रा का आयोजन करेगी. कपिल सिब्बल उस कमेटी के प्रमुख होंगे. 

१२ बजे - कपिल सिब्बल ने कहा कमेटी ने फैसला किया है कि सरकार तमाम यात्रा का खर्च वहन करेगी क्यूंकि जब सरकार हज पर जाने वालों को सब्सिडी दे सकती है तो  इस यात्रा का खर्च क्यूँ वहन नहीं कर सकती? उन्होंने आगे कहा कि सरकार के धर्मनिरपेक्ष स्वरुप को बरकरार रखने के लिए सरकार को इस यात्रा का खर्चा सरकार को वहन करना ही पड़ेगा.लेकिन सरकार को क्यूंकि इस तरह कि यात्राओं का कोई अनुभव नहीं है इसलिए सरकार तमाम ट्रवेल एजेंसियों से टेंडर मांगेगी.

१ बजे -  कलमाड़ी ने भी टेंडर भरा. उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजनों का उन्हें बहुत अनुभव है इसलिए राष्ट्रहित में उन्हें भी टेंडर भरने का अधिकार है. 

१ बजकर २ मिनट - सरकार ने टेंडर से ट्रवेल एजेंसियों की शर्त हटाई.

२ बजे - ए राजा ने कहा अगर सरकार कलमाड़ी को तो टेंडर भरने दे रही है. तो मुझे उन टेंडरों को पास और फेल करने का अधिकार दे. क्यूंकि मुझे भी इसका
बड़ा लंबा तजुर्बा है.

२ बजकर २ मिनट - सरकार ने राजा की बात मानी. राजा ने पहले लाओ पहले पाओ ( मतलब पहले आओ पहले पाओ ) की नीति का पालन करने की बात कही. 

३ बजे - देश के सारे कैदियों ने भी जमानत की अपील दाखिल की. सबने इसके लिए कलमाड़ी के फैसले को आधार बनाया कुछ ने गंगा नहाने के लिए. कुछ ने हज के लिए कुछ ने ननकाना साहिब की यात्रा के लिए तो कुछ ने वेटिकन की यात्रा के लिए जमानत मांगी.

४ बजे -  सभी धर्मों के धर्माचार्यों ने सुप्रीम कोर्ट को बधाई देते हुए कहा कि उसके एक फैसले से पूरे देश में धर्म कर्म का माहौल बन गया है.

५ बजे - प्रधानमंत्री ने इस मामले पर सर्वदलीय बैठक बुलाई. जिस में कोई फैसला नहीं हो पाया. बीजेपी ने कहा कि सरकार तत्काल लोक सभा का विशेष सत्र
बुलाए. जिसकी बैठक रात १२ बजे भी शुरू हो सकती है. 

६ बजे -  पूरे देश में तहलका. लोग सड़कों पर उतरे. 

७ बजे से अगले दिन १० बजे तक -  अपनी डपली अपना राग बजना शुरू. 

दिनांक १९ अगस्त -  ११ बजे- सुप्रीमकोर्ट ने कलमाड़ी समेत सभी कैदियों की जमानत रद्द की. न्यायालय ने कहा कि धार्मिक आज़ादी और आस्था के विषय कोर्ट
तय नहीं कर सकती. कोर्ट का काम सिर्फ कानूनों का पालन करवाना है.

१२ बजे - देश पुराने ढर्रे पर वापस लौटा




प्रकाश  कुकरेती 
साभार:भड़ास4मीडिया.कॉम 

Wednesday, June 6, 2012

सरकारी कर्मकांड, गंगा भक्त, आम जनता और गंगा संस्कृति

जून, 2112 की शाम । वाराणसी के गंगा रोड के किनारे बीयर बार की दुकान पर बैठे पाँच युवा मित्र। एक-एक बोतल पी लेने के बाद आपस में चहकते हुए………

तुमको पता है ? ये जो सामने 40 फुट चौड़ी गंगा रोड है न ! वहां आज से 100 साल पहले तक गंगा नदी बहती थी !

हाँ, हाँ पता है। आज भी बहती है। सड़क के नीचे नाले के रूप में।

सच्ची ! आज भी बहती है ? पहले नदी बहती थी तो उस समय पानी बीयर से सस्ता मिलता होगा !

बीयर से सस्ता ! अरे यार, बिलकुल मुफ्त मिलता था। चाहे जितना नहाओ, चाहे जितना निचोड़ो। और तो और मेरे बाबा कहते थे कि उस जमाने में यहाँ, जहाँ हम लोग बैठ कर बीयर पी रहे हैं, गंगा आरती हुआ करती थी।

ठीक कह रहे हो। मेरे बाबा कहते हैं कि यहां से वहाँ तक इस किनारे जो बड़े-बड़े होटल बने हैं न, लम्बे-चौड़े घाट हुआ करते थे और नदी में जाने के लिए घाट किनारे पक्की सीढ़ियाँ बनी थीं।

तब तो नावें भी चलती होगी नदी में ? गंगा रोड के उस किनारे जो लम्बा ब्रिज है वो दूसरा किनारा रहा होगा क्यों ?

और नहीं तो क्या दूर-दूर तक रेतीला मैदान हुआ करता था, जहाँ लोग नैया लेकर निपटने जाते थे और लौटते वक्त नाव में बैठ कर भांग बूटी छानते थे।

भांग-बूटी ? बीयर नहीं पीते थे !

चुप स्साले ! तब लोग गंगा नदी को माँ की तरह पूजते थे। नैया में बैठकर कोई बीयर पी सकता था भला ?

उहं ! बड़े आए माँ की तरह मानने वाले। क्या तुम यह कहना चाहते हो कि माँ मर गई और हमारे पूर्वज देखते रह गये ? कुछ नहीं किया ?

हमने इतिहास की किताब में पढ़ा है। राजा भगीरथ गंगा को धरती पर लाये थे।

यह नहीं पढ़ा कि हमारे दादाओं, परदादाओं ने पहले नदी में इतना मल-मूत्र बहाया कि वो गंदी नाली बन गई और बाद में गंदगी छुपाने के लिए लोक हित में उस पर चौड़ी सड़क बना दी !

बड़े शातिर अपराधी थे हमारे पुर्वज। माँ को मार कर अच्छे से दफन कर दिये।

अरे यार ! गंदी नाली को रखकर भी क्या करते ? अब तो ठीक है न। नाली नीचे, ऊपर सड़क। विज्ञान का चमत्कार है।

विज्ञान का चमत्कार ! इतना ही चमत्कारी है विज्ञान तो क्यों नहीं गंगा की तरह एक नदी निकाल देता ? बात करते हो ! पानी का बिल तुम्हीं देना मेरे पास पैसा नहीं है । बाबूजी से मुश्किल से दो हजार मांग कर लाया थो वो भी खतम हो गया। सौ रूपया गिलास पानी, वो भी खारा !

जानते हो ! मैने पढ़ा है कि सौ, दो सौ साल पहले गंगा नदी का पानी अमृत हुआ करता था। जो इसमें नहाता था उसको कोई रोग नहीं होता था। तब लोग नदी के पानी को गंगाजल कहते थे। पंडित जी, गंगा स्नान के बाद कमंडल या तांबे-पीतल के गगरे में भरकर ठाकुर जी को नहलाने के लिए या पूजा-आचमन के लिए ले जाते थे। सुना है दूर-दूर से तीर्थ यात्री आते और गंगाजल को बड़ी श्रद्धा से प्लास्टिक के बोतल में रख कर ले जाते।

हा…हा…हा…दूर के यात्री ! प्लास्टिक के बोतल में गंगाजल घर ले जाते थे ! घर ले जाकर सड़ा पानी पीते और मर जाते थे । क्या बकवास ढील रहे हो ! एक बोतल बीयर ही फुल चढ़ गई क्या ?

पागल हो ! जब कुछ पता न हो तो दूसरे की बात को ध्यान से सुननी चाहिए। तुम्हे जानकर आश्चर्य होगा कि गंगाजल कभी सड़ता ही नहीं था। उसमें कभी कीड़े नहीं पड़ते थे।

क्या बात करते हो ! गंगाजल में कभी कीड़े नहीं पड़ते थे ? इसी पानी को घर ले जाओ तो फ्रेशर से फ्रेश किये बिना दूसरे दिन पीने लायक नहीं रहता और तुम कह रहे हो कि गंगाजल में कभी कीड़ा नहीं पड़ता था !

हाँ मैं ठीक कह रहा हूँ। गंगा में पहाड़ों से निकलने वाली जड़ी-बूटियाँ इतनी प्रचुर मात्रा में घुल जाती थीं कि उसका पानी कभी सड़ता ही नहीं था। माँ के जाने के बाद यह धरती अनाथ हो गई है।

इससे भी दुःख की बात तो यह है कि हम अपन संस्कृति को इतनी जल्दी भूल चुके हैं !

ठीक कह रहे हो। हमारी सरकारों ने भी संस्कृति को मिटाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। तुम्हें पता है एक समय था जब वाराणसी में तीन-तीन नदियाँ बहती थीं। वरूणा, अस्सी और गंगा।

हाँ मैने सुना है। बनारस का नाम वाराणसी इसीलिए पड़ा कि यह वरूणा और अस्सी नदी के बीच बसा था। दायें बायें अस्सी-वरूणा और सामने गंगा नदी।

कल्पना करो…. तब यह कितना रमणीक स्थल रहा होगा !

पहले अस्सी नदी के ऊपर लोगों ने अपने घर बनाये फिर वरूणा नदी को पाट कर लिंक रोड निकाल दिया। गंगा नदी तो तुम्हारे सामने है ही….गंगा रोड।

इस सड़क का नाम क्यों गंगा रोड रख दिया ?

हा हा हा…हमारी सरकार चाहती है कि है जब लोग यहाँ बैठें तो बीयर पी कर थोड़ी देर इस नाम पर सोंचे और अपनी संस्कृति के विषय में आपस में चर्चा करें।

हाँ। सरकारें, संस्कृति की रक्षा ऐसे ही किया करती हैं।

गंगा बैराज कानपुर : गंगा के अस्तित्व को चुनौती

गंगा बैराज शहर के विस्तारीकरण की एक महत्वकांक्षी योजना जैसा प्रतीत होता है. कहना मुश्किल है कि रिवर व्यू अपार्टमेन्ट और फूलों फव्वारों वाले पार्कों की तैयारी में लगा विकास प्राधिकरण शायद पुराने कानपूर, तिवारी घाट, रानी घाट और साथ लगे हुए हिस्सों को बंद आँखों से देखता है या कर्ज देने वालों की शर्त है कि उस तरफ न देखा जाए. रामकी एनवायरो इंजिनीयर्स और जियो मिलर जैसी कम्पनियाँ किस श्रद्धा के साथ गंगा सेवा में जुडी हैं यह तो मौके की मुआयना करने वालों को नज़र आ जाता है. अंतर निहित उद्देश्यों और दूरगामी परिणामों की बात न भी करें तो भी यह अनायास ही नज़र आ जाता है कि सरकारी परियोजनाएं सफ़ेद हाथी बनती हैं तो कैसे? संवाद करने से ऐसा लगता है कि स्थानीय लोगों को गंगा बैराज के नफे नुकसान से कोई सरोकार नहीं न ही सरकार या सरकारी तंत्र को इसकी को परवाह है.. कच्चे पक्के मकान, टूटी सड़के, बजबजाती नालियाँ, और गंगा जी में प्रत्यक्ष प्रवाहित होते नालों को देख कर तो कतई नहीं कहा जा सकता है कि इस परियोजना का उद्देश्य गंगाजी की निर्मलता या जनसामान्य के भले के लिए किया गया है. ये तो तात्कालिक परिस्थितियां हैं. साथ ही जल प्रवाह और बैराज के फाटकों कि स्थिति देखें तो और स्पष्ट हो जाता है कि गंगा जी के पारिस्थिकीय तंत्र और उसके प्रवाह में कोई सम्बन्ध है या नहीं ये शायद शासक वर्ग और उनके तकनीकी विशेषज्ञों क समझ के लिए दूर की कौड़ी है. जल उपलब्धता इतनी न्यून है की सिर्फ एक फाटक से निहायत प्रदूषित पीले जल की. निकासी करके छद्म प्रवाह की स्थिति बनती है. देख कर समाज नहीं आता है की यही शहर के प्रारंभ में यह हालत है तो शहर के पेय जल और थोड़ी बहुत सिंचाई के बाद यदि 19 नालों का पानी न मिलाया जाए तो कानपुर के दूसरे दूसरे छोर पर गंगा एक नदी के रूप में कैसे पहुंचेगी ? अब कानपुर में यह हालत है तो इलाहबाद और बनारस में गंगा एक नदी के रूप में पहुँचती है या नालों के एक समग्र प्रवाह के रूप में इसकी अनदेखी कैसे की जा सकती है.. वैसे तो कानपुर के एक छोर से दूसरे छोर तक हालत विशेष रूप से किनारों पर रहने वाले पीड़ित जनों की स्थिति लगभग एक जैसी है लेकिन शहर के ही भद्र जनों और गंगा भक्तो की समझ कैसी है गंगा जी का अस्तित्व इस पर भी बहुत निर्भर करता है.











Monday, June 4, 2012

पर्यावरण सम्बन्धी मुकदमेबाजी का नया युग


Geo-politics of environmental privatization :Green or suspected green?
भारत एक ऐसा देश है, जिसका पर्यावरण संबंधी आंदोलनों, ज़मीनी स्तर पर सक्रियता और उत्तरदायी उच्च न्यायपालिका का अपना समृद्ध इतिहास रहा है. ऐसे देश में 2011 का वर्ष पर्यावरण संबंधी मुकदमेबाज़ी का अत्यंत महत्वपूर्ण वर्ष अर्थात मील का पत्थर साबित हुआ है. यद्यपि पर्यावरण संबंधी मुक़दमेबाज़ी पिछले तीन दशकों में काफ़ी बढ़ गई है, लेकिन पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना के कारण 2011 का वर्ष फिर भी काफ़ी विशिष्ट है. केवल यही एकमात्र तथ्य नहीं है कि इसकी स्थापना की गई, क्योंकि इससे पहले भी ऐसे ही एक अधिकरण की स्थापना की गई थी, जो इससे कम शक्तिशाली था. लेकिन जिस तरह से उच्चतम न्यायालय द्वारा पर्यावरण और वन मंत्रालय को इस दिशा में सक्रियता से प्रेरित किया गया, वह इसकी विशेषता बन गई. राष्ट्रीय हरित अधिकरण का पहला क़दम और इसे पूरी तरह से स्थापित करने का निरंतर संघर्ष काफ़ी महत्वपूर्ण रहा है. पर्यावरण संबंधी मामलों पर केंद्रित और गठित राष्ट्रीय हरित अधिकरण के क़ानून को जून, 2010 में राष्ट्रपति की स्वीकृति तो मिल गई थी, लेकिन इसे केंद्र सरकार की अधिसूचना के ज़रिये उस वर्ष के  दौरान 18 अक्टूबर को ही लागू किया जा सका. उसी दिन भारत के उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति एलएस पांटा को इसके पहले अध्यक्ष के रूप में नियुक्त कर दिया गया, हालांकि न तो किसी अन्य सदस्य को तब तक नियुक्त किया जा सका था और न ही इसके लिए बुनियादी ढांचा और र्स्टों मुहैया कराया जा सका था.
“राष्ट्रीय हरित अधिकरण का गठन पर्यावरण और वन व अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित प्रभावी और शीघ्र निपटान के लिए किया गया था. यद्यपि राष्ट्रीय हरित अधिकरण का अभी मूल्यांकन करना कदाचित जल्दबाज़ी होगी, लेकिन इतनी व्यापक शक्तियों और न्याय-सीमा के साथ ऐसे विशिष्ट अधिकरण के अस्तित्व से ही भारत में पर्यावरण संबंधी क़ानूनी मुद्दों का समय पर निपटारा किया जा सकता है.”
राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम के लागू होने से दो वर्तमान क़ानून स्वतः ही भंग हो गए हैं. राष्ट्रीय पर्यावरण अधिकरण अधिनियम 1995 और राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण अधिनियम 1997 और इसी कारण राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण भी समाप्त हो गया, जिसे पर्यावरण संबंधी परियोजनाओं के लिए दिए गए अनुमोदनों के खिलाफ़ सुनवाई करने के लिए एक अर्ध-न्यायिक निकाय के रूप में प्राधिकृत किया गया था. राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण के सामने लंबित सभी मामलों की सुनवाई अब राष्ट्रीय हरित अधिकरण करेगा. इसके बंद हो जाने से एक न्यायिक शून्य पैदा हो गया था और नए मामलों की सुनवाई के लिए कोई मंच नहीं रह गया था और सभी लंबित मामले अधर में लटक गए थे. अध्यक्ष के अलावा कम से कम एक और सदस्य की नियुक्ति के बिना राष्ट्रीय हरित अधिकरण काम ही नहीं कर सकता था. यद्यपि पर्यावरण और वन मंत्रालय ने विनियामक अनुमोदन देना जारी रखा, लेकिन उन्हें चुनौती देने के लिए कोई न्यायिक निवारण तंत्र नहीं रह गया था. यह स्थिति अनिश्चित काल तक बनी रहती, यदि उच्चतम न्यायालय ने यह निर्देश न दिया होता कि पर्यावरण और वन मंत्रालय नए अधिकरण की स्थापना के संबंध में की गई प्रगति से उन्हें नियमित रूप में अवगत कराता रहे. इसके परिणाम स्वरूप 5 मई, 2011 को तीन न्यायिक सदस्यों और चार विशेषज्ञ सदस्यों को नियुक्त किया गया और राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने अपनी पहली सुनवाई 25 मई, 2011 को शुरू की.
राष्ट्रीय हरित अधिकरण की न्याय-सीमा का दायरा अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण से कहीं अधिक व्यापक है. इसके अंतर्गत वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता सहित सात क़ानूनों के कार्यान्वयन से पर्यावरण से संबंधित महत्वपूर्ण सवाल उठने वाले मामले भी सुने जा सकते हैं. यह केवल अपीलीय निकाय ही नहीं है, बल्कि इसके मूल क्षेत्राधिकार में कुछ खास कोटि के मामलों पर निर्णय देने का अधिकार भी आ जाता है. यह क्षतिपूर्ति के निर्णय दे सकता है और क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकीय और संपत्ति के फिर से बहाली के प्रत्यक्ष निर्णय भी दे सकता है.
आजकल नियमित सुनवाई की जाती है, लेकिन राष्ट्रीय हरित अधिकरण के सामने बड़ी संस्थागत चुनौतियां भी हैं. राष्ट्रीय हरित अधिकरण दो अलग-अलग परिसरों से अपना काम करता है, क्योंकि इनके अपने परिसर पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इस समय क़ाबिज़ है. कुल दस न्यायिक और दस विशेषज्ञ सदस्यों में से केवल दो न्यायिक और चार विशेषज्ञ सदस्यों की ही अब तक नियुक्ति की गई है और अध्यक्ष ने इस्तीफ़ा दे दिया है. लगता है कि सरकार सदस्यों के लिए उपयुक्त स्थान उपलब्ध कराने में असमर्थ है. पुणे, कोलकाता और चेन्नई की सर्कट बेंचों में अभी तक सुनवाई शुरू भी नहीं हुई है, जबकि भोपाल बेंच में उद्‌घाटन के रूप में पहली सुनवाई पिछले नवंबर में ही हो गई थी. दिलचस्प बात तो यह है कि जब राष्ट्रीय हरित अधिकरण को पहले पहल संसद में पेश किया गया तो तत्कालीन पर्यावरण एवं वन मंत्री 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के प्रतीक के रूप में राष्ट्रीय हरित अधिकरण की पहली बेंच की स्थापना भोपाल में ही कराने के लिए उत्सुक थे, लेकिन अधिनियम के पारित होने से पहले ही यह प्रस्ताव त्याग दिया गया.
पिछले नौ महीनों में लगभग अस्सी मामले राष्ट्रीय हरित अधिकरण के सामने आए हैं. राष्ट्रीय हरित अधिकरण की व्यापक न्याय-सीमा के आधार पर अनेक प्रकार के मुद्दे उठाए गए. इन मुद्दों में बिजली परियोजनाओं को पर्यावरण संबंधी अनुमोदन प्रदान करने से जुड़े मामलों को चुनौती देने से लेकर वन्य भूमि के उपयोग के लिए सरकार द्वारा अनुमति देने तक और वायु एवं शोर प्रदूषण तक के मामले भी शामिल थे. जहां राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण में जाने वाले लोग मुख्यतः परियोजनाओं से प्रभावित लोग या समुदाय-आधारित संगठन ही होते थे, वहीं राष्ट्रीय हरित अधिकरण में जो आवेदक आते हैं, उनमें प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के निर्णयों से प्रभावित छोटे और मध्यम आकार के उद्यमियों से लेकर उन पर थोपी गई नियामक स्थितियों को चुनौती देने वाली बड़ी कंपनियां भी शामिल होती हैं. इस प्रकार राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण के विपरीत राष्ट्रीय हरित अधिकरण के आवेदकों में व्यापक स्तर पर विविध प्रकार के आवेदक होते हैं. अपनी स्थापना से लेकर अब तक राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने अनेक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाए हैं.
अधिकरण के सामने देरी से लाए गए मामलों के संबंध में भी राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने उदार रु़ख अपनाया है, ताकि न्याय पाने के इच्छुक लोगों के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण के दरवाज़े लंबे समय तक खुले रखे जा सकें. क़ानून के अनुसार, यदि कोई सरकारी निर्णय को चुनौती देना चाहता है तो उसे निर्णय जारी होने की तारी़ख के  तीस दिनों के अंदर ही राष्ट्रीय हरित अधिकरण से संपर्क करना चाहिए. राष्ट्रीय हरित अधिकरण से संपर्क करने का समय साठ दिनों तक तभी बढ़ाया जा सकता है, जब विलंब करने के पर्याप्त कारण मौजूद हों और अधिकरण इसे स्वीकार या अस्वीकार भी कर सकता है, लेकिन नब्बे दिन बीत जाने पर इस अवधि को बढ़ाने का राष्ट्रीय हरित अधिकरण के पास कोई उपाय शेष नहीं बचता. हिमाचल प्रदेश में पन-बिजली परियोजना के निर्माण के लिए वन्य भूमि के दिशा-परिवर्तन को चुनौती देने वाले एक अपीलकर्ता ने निर्णय लिए जाने के 90वें दिन राष्ट्रीय हरित अधिकरण से संपर्क किया था. राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने विलंब के कारण को स्वीकार करते हुए उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय को मंज़ूर करते हुए कि यदि विवादी की तरफ़ से कोई लापरवाही या देरी नहीं की गई है और विवादी सदाशयी है तो ऐसे मामले में उदार रु़ख अपनाया जा सकता है, यह व्यवस्था दी कि विलंब की व्याख्या का कोई बना-बनाया सीधा फॉर्मुला नहीं हो सकता.
राष्ट्रीय हरित अधिकरण का दूसरा महत्वपूर्ण निर्णय इस बात पर था कि अधिकरण से कौन संपर्क कर सकता है अर्थात कौन इसके लिए क़ानूनी रूप से अधिकारी है. राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने यह व्यवस्था दी कि कोई भी व्यक्ति प्राकृतिक पर्यावरण के संरक्षण और सुधार के संबंध में अधिकरण से तब तक संपर्क कर सकता है, जब तक कि उसकी याचिका तुच्छ न हो. यह निर्णय बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे अधिक से अधिक हितधारक पर्यावरण के संबंध में क़ानूनी सवाल उठा सकते हैं और इससे उसका दायरा और भी बढ़ सकता है. ज़रूरी नहीं है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण से संपर्क करने वाले लोग सरकार के किसी निर्णय (जैसे ताप बिजली घर या बांध बनाने के लिए अनुमोदन देना आदि) से सीधे प्रभावित या घायल हुए हों. कोई भी व्यक्ति जिसके पास यह मानने का कोई कारण हो कि सरकार के किसी निर्णय से प्राकृतिक पर्यावरण पर बुरा असर पड़ सकता है, अधिकरण से संपर्क कर सकता है.
खनन कार्य से संबंधित गुण-दोषों पर आधारित एक निर्णय पर परियोजना से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव के मूल्यांकन में हुई चूकों का पता लगाते समय राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने भारत में पर्यावरण संबंधी प्रभाव के  मूल्यांकन की कमियों पर टिप्पणी की थी. पहली टिप्पणी थी, 10 किमी के अर्धव्यास के अंदर अन्य परियोजनाओं के संचयी प्रभाव के मूल्यांकन में कमी, दूसरी टिप्पणी यह है कि पर्यावरण संबंधी प्रभाव का मूल्यांकन उन सलाहकारों द्वारा किया जाता है, जिनका भुगतान परियोजना के समर्थकों द्वारा किया जाता है, हितों का टकराव होने लगता है और इस बात की भी संभावना बनी रहती है कि कुछ भीतरी सूचनाएं, जो समर्थकों के खिलाफ़ जा सकती हैं उन्हें प्रकट न किया जाए और तीसरी टिप्पणी यह है कि वे सलाहकार जिनकी पर्यावरण संबंधी प्रभाव के मूल्यांकन की रिपोर्ट के आधार पर निर्णय लिए जाते हैं, वे अपनी सूचना के लिए किसी के प्रति भी जवाबदेह नहीं हैं. पर्यावरणविदों द्वारा ये मामले बार-बार उठाए जाते रहे हैं, लेकिन सरकार द्वारा इन पर न तो किसी नीति की घोषणा की जाती है और न ही विधायी प्रतिक्रिया प्रकट की जाती है. राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने अंततः यह निर्णय कर लिया है कि किसी भी अनुमोदन को तब तक आस्थगित रखा जाएगा जब तक कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय परियोजना और पर्यावरण पर पड़ने वाले उसके प्रभाव का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर लेता. पर्यावरण संबंधी विधिवेत्ताओं ने इन मिसालों का स्वागत किया है और इन्हें प्रगतिशील कहा है और साथ ही साथ राष्ट्रीय हरित अधिकरण के आदेश बहुत सावधानी से लिए गए हैं. उदाहरण के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने मामलों के लंबित रहते हुए परियोजना-स्थलों पर काम रोकने से इंकार भी किया है और यह व्यवस्था भी दी है कि परवर्ती चरण में कपनियां इक्विटी के लिए दावा नहीं कर सकतीं या दूसरे शब्दों में अब बहुत देर हो गई है, इसलिए अब कुछ नहीं किया जा सकता. परंतु दुख केवल इस बात का रह जाता है कि एक बार उजड़ी हुई जनजातियां और पर्यावरण को दोबारा नहीं बसाया या संवारा जा सकता.
राष्ट्रीय हरित अधिकरण का गठन पर्यावरण और वन व अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित प्रभावी और शीघ्र निपटान के लिए किया गया था. यद्यपि राष्ट्रीय हरित अधिकरण का अभी मूल्यांकन करना कदाचित जल्दबाज़ी होगी, लेकिन इतनी व्यापक शक्तियों और न्याय-सीमा के साथ ऐसे विशिष्ट अधिकरण के अस्तित्व से ही भारत में पर्यावरण संबंधी क़ानूनी मुद्दों का समय पर निपटारा किया जा सकता है.
साभार :चौथी दुनिया

DEATH OF RIVER PANDU IN KANPUR


Residents of more than 50 villages situated along the Pandu river, a tributary of Ganga which passes through Kanpur, are a disgruntled lot. They are bearing the brunt of the rampant pollution caused by the draining of ash slurry from Panki Power Thermal Plant and effluents thrown by a number of industries including some units of Ordinance into river Pandu. Even worse, tonnes of sewage are also fouling its water. No wonder, Pandu river which was known for its crystal clear water two decades back has turned black. It also stinks. The magnitude of the contamination can be gauged from the fact that many of the people exposed to the water are suffering from a host of skin problems.
Even though the deplorable condition of river water has been brought to the notice of the authorities concerned, no action has been taken in this regard. And the poisoning of Pandu continues. The biggest villain of the piece is the Panki Thermal Power Plant. According to sources, the plant uses around 3,000 tones of coal and churns out 40 tonnes of fly ash every day. The ash is dumped in a fly ash pond spread over an area of two square kilometers. The slurry overflows from the pond and finds its way into Pandu. An ambitious project for safe disposal of the fly ash is awaiting sanction from the central government.
The source of Pandu river is a lake in Farrukhabad. The river runs for around 120 kilometres and meets the Ganga in Fatehpur. Before Pandu enters Kanpur, its water is greenish. The tonnes of fly ash slurry mingles with the river and changes its colour to silvery grey. Further downstream, when drains of domestic sewage and industrial effluent mix with the river, its water turns black.
The plight of the villagers is aggravated once monsoon recedes as the river water leaves behind a blanket of fly ash on a large tract of agricultural land. The ash is deposited in the fields even in the dry season as the farmers use its ash-laden water, rich in mercury, to irrigate their fields. Large deposits of such slurry can be found in these fields which have an adverse affect on productivity. Hapless villagers in the area complain that some of their lands have become uncultivable. Fly ash slurry makes the soil less porous and impedes aeration as a result of which lands turn fallow, claim the farmers. Earlier, the land along the Pandu river was known to be highly fertile. The kahars, a local backward community, were leased out the land to grow vegetables every year. However, due to pollution from Thermal Power Plant, there are no takers for the land.
Effluents generated by around 6,000 small, medium and big industrial units located in Panki and Dadanagar industrial areas are also discharged into the four nalas (storm water drains) that fall into the Pandu river. Most of these industries are of electroplating, detergents, chemicals (processing chrome sulphate also), waste oil processing and some Ordinance units. Villagers claim that when the Gun Factory releases toxic black oil into the river, fish die in shoals. Some locals also pointed out that their cattle die within hours if they consume the river water accidentally. Despite this, the Central Pollution Control Board (CPCB) has not undertaken any study of the industrial pollution in the area, let alone the pollution of the Pandu river. In the absence of any scientific study, no one knows the exact chemical composition of the effluent and sewage being carried by the nalas into the river Pandu. 
With the virtual death of Pandu in Kanpur, thousands of villages have lost a vital water resource. Today the locals fear to even touch the river water. In case, they venture out into the water by mistake, they develop boils and rashes on their feet. The toxicity of the water has forced them to depend on groundwater for their water needs. However, industrial pollution has taken its toll on groundwater of the area too. It is apprehended that water at the depth of around 35 feet might contain dissolved ammonia, nickel, chromium and fluoride. In such a situation, people are left with using government-installed handpumps which draw water from a depth of 100 feet.
Under Ganga Action Plan Phase II (GAP II), the government proposes to make Pandu river pollution-free. The idea is to tap the sewage falling into the Pandu river through interception and diversion and then treat the same. This treated water is proposed to be used for irrigation.
Against the backdrop of various lacunae that have turned Ganga Action Plan into Ganga Inaction Plan, a number of questions need to be addressed immediately:-
  1. Under GAP II, three out of the four nalas falling into Pandu river would be tapped. The fourth nala (called the IEL drain) exclusively carrying industrial effluent has been ignored completely. Thus, wouldn’t the river continue to receive the industrial waste water even after the completion of GAP II?
  2. Has any study been undertaken to find out the chemical composition of the domestic sewage that is proposed to be tapped and treated under GAP II? There is no segregation of domestic and industrial waste water and hence, both get mixed in the drain. This has been corroborated by the recent test results conducted by IIT-EcoFriends which revealed the presence of hazardous chemicals and heavy metals in the domestic sewage reaching the treatment plants set up under GAP I.
  3. Under GAP II, a 200 million litre per day (mld) treatment plant is to be set up. The technology approved for the plant is Upflow Anaerobic Sludge Blanket (UASB) in which waste is treated through the growth of anaerobic bacteria. From the experience of 36 mld Common Effluent Treatment Plant (CETP), set up under GAP I to treat tannery waste water, it is well-established that the chromium and chemicals as well as other heavy metals present in the tannery waste stream affect the functioning of the plant adversely. Shouldn’t the presence of hazardous heavy metals and other chemicals be factored in the choice of the treatment technology for treating sewage mixed up with industrial effluents? Is the UASB technology appropriate for treating 200 mld of sewage mixed with industrial waste water?
If these questions are left unanswered, there is every possibility that GAP Phase II would become a replay of GAP I. And Pandu river would remain a flowing muck.

‘जोड़ने’ में न टूटें लक्ष्मण रेखाएं


Source: 
 गांधी मार्ग, मई - जून 2012
हिमालय का नक्शा ऊपर से देखें तो गंगा और यमुना का उद्गम बिल्कुल पास-पास दिखाई देगा लेकिन यह पर्वत का भूगोल ही है कि दोनों नदियों को प्रकृति ने अलग-अलग घाटियों में बहाया और फिर बहुत धीरज के साथ पर्वत को काट-काटकर प्रयाग तक पहुंच कर इनको मिलाया। न्याय देने वाला पक्ष-विपक्ष की लंबी-लंबी दलीलें सुनता है और तब वह नीर, क्षीर, विवेक के अनुसार फैसला सुनाता है। दूध का दूध और पानी का पानी। लेकिन नदी जोड़ो प्रसंग में अदालत ने दोनों बार दूध भुला दिया और पानी को पानी से जोड़ने का आदेश दे दिया है।
लगता है लक्ष्मण रेखाएं तोड़ने का यह स्वर्ण-युग आ गया है। जिसे देखो वह अपनी मर्यादाएं तोड़कर न जाने क्या-क्या जोड़ना चाहता है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने नदी जोड़ने के लिए सरकार को आदेश दिया है। एक समिति बनाने को कहा है और उसकी संस्तुतियां भी एक निश्चित अवधि में सरकार के दरवाजे पर डालने के लिए कहा है और शायद यह भी कि सरकार संस्तुतियां पाते ही तुरंत सब काम छोड़कर देश की नदियां जोड़ने में लग जाए! यह दूसरी बार हुआ है। इससे पहले एनडीए के समय में बड़ी अदालत ने अटलजी की सरकार को कुछ ऐसा ही आदेश दिया था, तब विपक्ष में बैठी सोनिया जी और पूरी कांग्रेस उनके साथ थी। एनडीए के भीतरी ढांचे में आज की तरह किसी भी घटक ने इसका कोई विरोध नहीं किया था। सबसे ऊपर बैठे राष्ट्रपति भी इस योजना को कमाल का मानते थे।

प्रधानमंत्री जी ने भी देश भर की नदियों को तुरंत जोड़ देने के लिए एक भारी-भरकम व्यवस्थित ढांचा बना दिया था और उसको चलाए रखने के लिए एक भारी-भरकम राशि भी सौंप दी थी। इसके संयोजक बनाए गए थे सुरेश प्रभू। नदी जोड़ना प्रभू का काम है। लेकिन प्रभू के बदले सुरेश प्रभु इसमें पड़े। सब कुछ होने के बाद भी अटलजी के समय में यह योजना लगातार टलती चली गई। इतनी टली कि यूपीए-1 और फिर निहायत कमजोर यूपीए-2 को भी पार करके वापस बड़ी अदालत के दरवाजे पर पहुंच गई। अब बड़ी अदालत ने फिर से वह पुलिंदा सरकार के दरवाजे पर फेंका है।

देश का नक्शा, देश का भूगोल इसकी इजाजत नहीं देता। यदि यह कोई करने लायक काम होता तो प्रकृति ने कुछ लाख साल पहले इसे करके दिखा दिया होता। आज के रेल मंत्रियों की तरह प्रकृति के नदी मंत्री ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक सीधी, सुंदर नदी बना दी होती। लेकिन उसने ऐसा कोई काम इसलिए नहीं किया क्योंकि कुछ करोड़ साल के इतिहास में देश का उतार-चढ़ाव, पर्वत, पठार और समुद्र की खाड़ी बनी है। उसमें देश के चारों कोनों से नदियों को जोड़कर बहाने की गुंजाइश ही नहीं है।

ऐसा नहीं है कि प्रकृति खुद नदी नहीं जोड़ती है। जरूर जोड़ती है लेकिन उसके लिए कुछ लाख साल धीरज के साथ काम करना होता है। हिमालय का नक्शा ऊपर से देखें तो गंगा और यमुना का उद्गम बिल्कुल पास-पास दिखाई देगा लेकिन यह पर्वत का भूगोल ही है कि दोनों नदियों को प्रकृति ने अलग-अलग घाटियों में बहाया और फिर बहुत धीरज के साथ पर्वत को काट-काटकर आज के इलाहाबाद तक पहुंच कर इनको मिलाया। समाज भी प्रकृति के इस कठिन परिश्रम को समझता था, इसलिए उसने ऐसी जगहों को एक्स, वाई, जेड जैसा अभद्र नाम देने के बदले तीर्थ की तरह, प्रयाग मन में बसाया। देश भर की सभी नदियों को देख लीजिए, उसमें जहां कहीं भी दूसरी नदी आकर मिलती है, उस जगह को बड़ी कृतज्ञता से तीर्थ की तरह याद रखता है।

कचहरियों का काम अन्याय सामने आने पर न्याय देने का होता है। यह काम भी किसी भावुकता के आधार पर नहीं होता। न्याय देने वाला पक्ष-विपक्ष् की लंबी-लंबी दलीलें सुनता है और तब वह नीर, क्षीर, विवेक के अनुसार फैसला सुनाता है। दूध का दूध और पानी का पानी। लेकिन नदी जोड़ो प्रसंग में अदालत ने दोनों बार दूध भुला दिया और पानी को पानी से जोड़ने का आदेश दे दिया है। बिना दलीलें सुने।

यह संभव है और यह स्वाभाविक भी है कि अदालत का ध्यान पानी की कमी से जूझ रहे क्षेत्रों और नागरिकों की तरफ जाए। और वह उन तक तुरंत पानी पहुंचाने के लिए सरकार को खींचे। लेकिन इसमें ऐसे आदेशों से किन्हीं और इलाकों पर कैसा अन्याय होगा, लगता है कि इसकी तरफ अदालत का ध्यान गया ही नहीं है। अदालत अगर अपने यहां चले मुकदमों के रजिस्टरों की धूल को झाड़कर देखे तो उसे पता चलेगा कि उसी के यहां नदियों के पानी के बंटवारों को लेकर अनेक राज्य सरकारों के मामले पड़े हैं। इनमें से कुछ पर अभी फैसला आना बाकी है और जिन भाग्यशाली मुकदमों में फैसले सुना दिए गए हैं, उन फैसलों को कई राज्य सरकारों ने मानने से इंकार कर दिया या यदि यह अवमानना जैसा लगे तो उसे ढंग से लागू नहीं होने दिया है। ये सूची बहुत लंबी है और इसमें सचमुच कश्मीर से कन्या कुमारी तक विवाद बहता मिल जाएगा।

हमारे देश में प्रकृति ने हर जगह एक सा पानी नहीं गिराया है। एक सा भू-जल नहीं दिया है। जैसलमेर से लेकर चेरापूंजी तक वर्षा के आंकड़ों में सैकड़ों या हजारों मिलीमीटर का अंतर पड़ता है। इन सब जगहों पर रहने वाले लोगों ने उन्हें जितना बरसात और पानी मिला, उसी में अपना काम बखूबी करके दिखाया था। लेकिन अब विकास का नया नारा सब जगह एक से सपने बेचना चाहता है और दुख की बात यह है कि इसमें न्याय देने वाले लोग भी शामिल होना चाह रहे हैं। नदी जोड़ो प्रसंग में अदालत ने दोनों बार दूध भुला दिया और पानी को पानी से जोड़ने का आदेश दे दिया है। ऐसे लोगों और संस्थाओं को अपनी-अपनी लक्ष्मण रेखाओं के भीतर रहना चाहिए और कभी रेखाओं को तोड़ना भी पड़े तो बहुत सोच-समझकर ऐसा करना चाहिए।